हकीकत नहीं भ्रम है यह...
चेहरे पर चमक है, जरूर लड़का होगा, चेहरा थोड़ा डल है, लड़की होगी। ये सारी कहावतें और वाक्य लोगों के जुबान से सुनने को मिल ही जाते हैं, जब घर में या आस-पड़ोस में कोई लडीज प्रेगनेंट होती है तो। किसी महिला को लड़का होगा या लड़की, साइंटिस्ट तो दूर, यहां तक कि डॉक्टर्स भी उसे देखकर नहीं पहचान पाते हैं।
महिला प्रेग्नेंट हुई नहीं कि दुनिया भर के टोटके घर वाले करने लगते हैं। कभी घर से बाहर सिर खुला रखकर नहीं निकलना तो कभी विधवा औरत की छाया से दूर रहना। इस तरह की तमाम हिदायत प्रेग्नेंट लेडीज को मिलनी शुरू हो जाती हैं। लड़का होगा या लड़की इसके लिए महिला नहीं, बल्कि पुरूष जिम्मेदार होता है। एक्सपट्र्स का कहना है कि होने वाला बेबी ब्वॉय होगा या गर्ल, मां बनने वाली महिला को देखकर नहीं पता लगाया जा सकता है। किसी महिला के चेहरे को देखकर यह कहना कि फेस साइन कर रहा है तो लड़का होगा या खट्टी चीजें खाने का मन कर रहा है तो लड़की होगी। यह केवल भ्रम होता है।
पुरूषों पर है निर्भर
अक्सर महिलाओं को ही लड़का या लड़की होने के लिए जिम्मेदार समझा जाता है और उसे ताने मारे जाते हैं।
एक्सपट्र्स का कहना है कि किसी भी परिवार में होने वाला बेबी क्या होगा, इसके लिए महिला नहीं बल्कि पुरूष जिम्मेदार होता है, क्योंकि महिला में 23 जोडे क्रोमोसोम केवल एक्स-एक्स होते हैं, जबकि पुरूष् में पाए जाने वाले 23 जोड़े क्रोमोसोम में 22 जोडे तो एक्स-एक्स होते हैं, लेकिन 23वां जोड़ा वाई का होता है, उसी पर लड़का होगा या लड़की निर्भर करता है।
यदि मेल का एक्स क्रोमोसोम फीमेल के एक्स क्रोमोसोम के साथ निषेचित होता है तो लड़की, जबकि मेल का वाई क्रोमोसोम फीमेल के एक्स क्रोमोसोम के साथ निषेचन की क्रिया करता है तो लड़का होता है। इसलिए लड़का होगा या लड़की इसके लिए दूर-दूर तक महिला जिम्मेदार नहीं होती है।
लग चुका है बैन
एक्सपट्र्स का कहना है किसी भी महिला को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि लड़का होगा या लड़की। अब्नॉटिक फ्लूएड को निकालकर क्रोमोसोम का टेस्ट कर केवल पता लगाया जा सकता है कि होने वाले बेबी का सेक्स क्या होगा, लेकिन इन सारे टेस्ट के ऊपर सरकार द्वारा बैन लगा दिया गया है। यदि इस टेस्ट को कोई कराता है तो उस पर कानूनी कारवाई की जाती है।
तुक्का हो जाता है सच
अक्सर देखने या सुनने को मिल जाता है कि घर के बुजुर्ग द्वारा कही गई बात कई बार सच हो जाती है। एक्सपट्र्स का मानना है कि प्रेग्नेंट लेडी को देखकर बुजुर्गो द्वारा कही गयी बात कई बार सच हो जाती है, लेकिन ये महज एक संयोग होता है।
डाइट का होता है इफेक्ट
प्रेग्नेंट लेडी के फेस पर साइनिंग होना या न होना, केवल उसके खानपान और बॉडी की टेंडेंसी पर निर्भर करता है। इससे उसे होने वाली बेबी के सेक्स का पता नहीं लगाया जा सकता है। बैलेंस डाइट लेने से महिला स्वस्थ रहती है और उसके चेहरे पर साइनिंग बरकरार रहती है।
Sunday, September 5, 2010
व्यक्तित्व का आइना भी है आपकी लिखावट
व्यक्तित्व का आइना भी है आपकी लिखावट
किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी लिखावट उसके व्यक्तित्व का आइना होती है। स्कूलों में लिखावट पर काफी ध्यान दिया जाता है ताकि छात्रों में बचपन से ही अक्षरों को सुन्दरता से लिखने की कला आ
जाए। कई-बड़ी कंपनियां तो लिखावट के आधार पर ही कर्मचारी को नौकरी दे रही हैं। सुन्दर लिखावट लोगों को अच्छी लगती है। स्कूल में शिक्षक हमेशा स्याही वाली कलम से बच्चों को लिखने की सलाह
देते थे ताकि लिखावट सुुन्दर बन सके। लेकिन अब दौर बदल गया है। बच्चे पेंसिल की बजाय पेन का प्रयोग करने लगे हैं। बावजूद इसके अच्छी लिखावट पर शिक्षक जोर देते हैं। छुटि्टयों के दौरान
बच्चों को अपनी लिखावट और बेहतर करने के लिए कहा जाता है। ग्रीष्मकालीन शिविर में कैलीग्राफी के माध्यम से बच्चों की लिखावट सुधारी जाती है।
लिखावट से व्यक्तित्व की तस्वीर-
भारत में आज भी 85 से 90 फीसदी बच्चे हाथ से लिखकर परीक्षा देते हैं। स्कूलों में छात्रों के ज्ञान के साथ-साथ उनकी लिखावट को भी महत्ता दी जाती है। पेपर में लिखावट के साथ-साथ स्पष्ट लिखावट
को भी महत्व दिया जाता है। कई छात्रों को सही उत्तर लिखने के बाद भी कम अंक मिलते हैंं क्योंकि उनकी लिखावट सुन्दर और स्पष्ट नहीं होती। देखने वालों को समझ नहीं आता और नंबर कम आ
जाते हैं। लिखावट सही नहीं होने से कई बार अक्षर एक दूसरे से मिल जाते हैं और देखने वालों को कुछ और पढ़ा जाता है। हमेशा याद रखें कि सुन्दर और स्पष्ट लिखावट से स्कूल, कालेज या दूसरी जगह
लोग आपको पसन्द करते हैं। सुन्दर लिखावट बेहतर ग्रेड भी दिला सकती है।
बढ़िया लिखावट उम्र की मोहताज नहीं-
किसी भी हुनर को हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती। अच्छी लिखावट का हुनर किसी भी उम्र में हासिल कर सकते हैं चाहे वह दस साल की उम्र में मिले या 60 साल की उम्र में। गलत ढंग से बैठना,
लिखते वक्त गलत ढंग से पेन पकड़ना यह कुछ मुख्य कारण हैं खराब लिखावट के। अगर हम जल्दी-जल्दी लिखते हैं तो कई बार जवाब गलत लिख जाते हैं। जब भी आप पेपर देने जाएं तो हमेशा अपनी
लिखावट पर ध्यान दें। छोटे बच्चों को भी अपनी लिखावट पर ध्यान देना चाहिए ताकि बड़े होकर उनकी लिखावट और सुन्दर व स्पष्ट बन सके।
सुन्दर लिखावट होती है दिमाग से-
किसी भी व्यक्ति की सुन्दर लिखावट उसके दिमाग की उपज होती है। एक व्यक्ति अगर सुन्दर लिखाई लिखता है तो वह मानसिक रूप से उस लिखावट को लिखना चाहता है। कई बार हम अपने भाव पर
काबू नहीं रख पाते, जिस वजह से हमारी लिखावट खराब हो जाती है। सुन्दर लिखावट के लिए आपको अपने दिमाग को सन्देश देना होगा। विज्ञान ने यह बात साबित कर दी है कि 21 दिन तक अगर
किसी भी चीज को पाने की कोशिश लगातार की जाए तो वह मिल जाती हैं। अपने विचार या अपनी लिखावट में भी फर्क के लिए आपको सिर्फ 21 दिन का वक्त तो चाहिए ही।
लिखने का सही तरीका-
सुन्दर और स्पष्ट लिखावट आपको बेहतर नंबर या ग्रेड दिला सकती है। सुन्दर लिखावट के लिए हमेशा कर्सिव (प्रवाही) लिखावट की सलाह दी जाती है। लिखने का सही तरीका यह है कि आप अपनी
कलम को एक इंच ऊपर से पकड़ें और 30 सेंटीमीटर की दूरी कागज और अपनी आखों से रखें। शिक्षकों को चाहिए कि वह शुरू से ही बच्चों को सुन्दर और स्पष्ट लिखावट लिखने की प्रेरणा देते रहें।
अभिभावक भी बच्चों की लिखावट पर नज़र रखें और उन्हें समझाएं और लिखना भी सिखाएं। खुद भी लिख कर दिखाएं। इससे उन पर प्रभाव पड़ता है।
कुछ विशेष बातें-
सुन्दर और स्पष्ट लिखावट आपकी मानसिक विशेषता को दर्शाता है। जो लोग बड़ी कंपनी में बड़े पद जैसे ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर या जनरल मैनेजर बनना चाहते हैं उन्हें लिखावट के आधार पर भी प्रमोशन
दी जाती है। सुन्दर लिखावट किसी भी व्यक्ति की विशेषता को दर्शाता है जैसे बुद्धिमत्ता, सच्चाई, ईमानदारी, बातचीत का तरीका और आत्मविश्वास। इसलिए लिखावट न सिर्फ आपके व्यक्तित्व का हिस्सा है
बल्कि आपके प्रोफेशनल जीवन के प्रति सोच को भी प्रकट करता है।
किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी लिखावट उसके व्यक्तित्व का आइना होती है। स्कूलों में लिखावट पर काफी ध्यान दिया जाता है ताकि छात्रों में बचपन से ही अक्षरों को सुन्दरता से लिखने की कला आ
जाए। कई-बड़ी कंपनियां तो लिखावट के आधार पर ही कर्मचारी को नौकरी दे रही हैं। सुन्दर लिखावट लोगों को अच्छी लगती है। स्कूल में शिक्षक हमेशा स्याही वाली कलम से बच्चों को लिखने की सलाह
देते थे ताकि लिखावट सुुन्दर बन सके। लेकिन अब दौर बदल गया है। बच्चे पेंसिल की बजाय पेन का प्रयोग करने लगे हैं। बावजूद इसके अच्छी लिखावट पर शिक्षक जोर देते हैं। छुटि्टयों के दौरान
बच्चों को अपनी लिखावट और बेहतर करने के लिए कहा जाता है। ग्रीष्मकालीन शिविर में कैलीग्राफी के माध्यम से बच्चों की लिखावट सुधारी जाती है।
लिखावट से व्यक्तित्व की तस्वीर-
भारत में आज भी 85 से 90 फीसदी बच्चे हाथ से लिखकर परीक्षा देते हैं। स्कूलों में छात्रों के ज्ञान के साथ-साथ उनकी लिखावट को भी महत्ता दी जाती है। पेपर में लिखावट के साथ-साथ स्पष्ट लिखावट
को भी महत्व दिया जाता है। कई छात्रों को सही उत्तर लिखने के बाद भी कम अंक मिलते हैंं क्योंकि उनकी लिखावट सुन्दर और स्पष्ट नहीं होती। देखने वालों को समझ नहीं आता और नंबर कम आ
जाते हैं। लिखावट सही नहीं होने से कई बार अक्षर एक दूसरे से मिल जाते हैं और देखने वालों को कुछ और पढ़ा जाता है। हमेशा याद रखें कि सुन्दर और स्पष्ट लिखावट से स्कूल, कालेज या दूसरी जगह
लोग आपको पसन्द करते हैं। सुन्दर लिखावट बेहतर ग्रेड भी दिला सकती है।
बढ़िया लिखावट उम्र की मोहताज नहीं-
किसी भी हुनर को हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती। अच्छी लिखावट का हुनर किसी भी उम्र में हासिल कर सकते हैं चाहे वह दस साल की उम्र में मिले या 60 साल की उम्र में। गलत ढंग से बैठना,
लिखते वक्त गलत ढंग से पेन पकड़ना यह कुछ मुख्य कारण हैं खराब लिखावट के। अगर हम जल्दी-जल्दी लिखते हैं तो कई बार जवाब गलत लिख जाते हैं। जब भी आप पेपर देने जाएं तो हमेशा अपनी
लिखावट पर ध्यान दें। छोटे बच्चों को भी अपनी लिखावट पर ध्यान देना चाहिए ताकि बड़े होकर उनकी लिखावट और सुन्दर व स्पष्ट बन सके।
सुन्दर लिखावट होती है दिमाग से-
किसी भी व्यक्ति की सुन्दर लिखावट उसके दिमाग की उपज होती है। एक व्यक्ति अगर सुन्दर लिखाई लिखता है तो वह मानसिक रूप से उस लिखावट को लिखना चाहता है। कई बार हम अपने भाव पर
काबू नहीं रख पाते, जिस वजह से हमारी लिखावट खराब हो जाती है। सुन्दर लिखावट के लिए आपको अपने दिमाग को सन्देश देना होगा। विज्ञान ने यह बात साबित कर दी है कि 21 दिन तक अगर
किसी भी चीज को पाने की कोशिश लगातार की जाए तो वह मिल जाती हैं। अपने विचार या अपनी लिखावट में भी फर्क के लिए आपको सिर्फ 21 दिन का वक्त तो चाहिए ही।
लिखने का सही तरीका-
सुन्दर और स्पष्ट लिखावट आपको बेहतर नंबर या ग्रेड दिला सकती है। सुन्दर लिखावट के लिए हमेशा कर्सिव (प्रवाही) लिखावट की सलाह दी जाती है। लिखने का सही तरीका यह है कि आप अपनी
कलम को एक इंच ऊपर से पकड़ें और 30 सेंटीमीटर की दूरी कागज और अपनी आखों से रखें। शिक्षकों को चाहिए कि वह शुरू से ही बच्चों को सुन्दर और स्पष्ट लिखावट लिखने की प्रेरणा देते रहें।
अभिभावक भी बच्चों की लिखावट पर नज़र रखें और उन्हें समझाएं और लिखना भी सिखाएं। खुद भी लिख कर दिखाएं। इससे उन पर प्रभाव पड़ता है।
कुछ विशेष बातें-
सुन्दर और स्पष्ट लिखावट आपकी मानसिक विशेषता को दर्शाता है। जो लोग बड़ी कंपनी में बड़े पद जैसे ह्यूमन रिसोर्स मैनेजर या जनरल मैनेजर बनना चाहते हैं उन्हें लिखावट के आधार पर भी प्रमोशन
दी जाती है। सुन्दर लिखावट किसी भी व्यक्ति की विशेषता को दर्शाता है जैसे बुद्धिमत्ता, सच्चाई, ईमानदारी, बातचीत का तरीका और आत्मविश्वास। इसलिए लिखावट न सिर्फ आपके व्यक्तित्व का हिस्सा है
बल्कि आपके प्रोफेशनल जीवन के प्रति सोच को भी प्रकट करता है।
क्या आप भी मोबाइल फोन से परेशान हैं
क्या आप भी मोबाइल फोन से परेशान हैं
नन्हा सा सेलफोन ज्यादातर लोगों के लिए जीवन का जरूरी हिस्सा बन गया है। संचार की इस छोटे कद की बड़ी सी सुविधा से बड़े-बड़े काम बहुत आसानी से किए जा सकते हैं लेकिन सलीके से इनका
इस्तेमाल न करने पर यह काम की चीज आपको झुंझलाने के लिए मजबूर भी कर सकती है। दूरसंचार नियामक ट्राई के अनुसार मई 2010 के अन्त तक देश में सेलफोन उपभोक्ताओं की संख्या 61.753
करोड़ थी। अनुसंधान फर्म गार्टनर के आंकड़े कहते हैं कि वर्ष 2014 तक देश में सेलफोन कनेक्शनों की संख्या बढ़कर 99.3 करोड़ हो जाएगी। गार्टनर का यह भी अनुमान है कि भारत में इस साल के अन्त
तक मोबाइल फोनधारकों की संख्या 66 करोड़ पर पहुंच जाएगी।
भारत अपने पड़ोसी मुल्क चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सेल फोन बाजार है। बहरहाल, `मोबाइलोफोबिया? के इस बढ़ते चलन ने तौर-तरीकों की एक अलग संहिता तय करने की जरूरत का भी
एहसास कराया है। अगर ढंग नहीं बदले तो यह सेलफोन दुश्वारियों की वजह भी बन जाता है। एटीकेट स्पेशलिस्ट उपासना सिंह कहती हैं कि मीटिंग, अस्पताल, अदालत परिसर, थिएटर, सिनेमाघर,
पूजाघर, स्कूल आदि में सेलफोन की घंटी गहरा व्यवधान उत्पन्न करती है। इसलिए इन स्थानों पर जाने से पहले सेलफोन को वायसमेल पर या वाइब्रेशन पर रखना चाहिए ताकि किसी को व्यवधान न हो।
मीटिंग में सेल फोन को बन्द कर देना ही बेहतर होता है।
एक अन्य एटीकेट स्पेशलिस्ट गौरव दास कहते हैं कि सेलफोन पर कई लोग जोर-जोर से बातें करते हैं जिससे निजी या गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक हो सकती हैं। इसी तरह घरेलू बातें भी दूसरों को
मुस्कुराने के साथ-साथ बौखलाने पर मजबूर कर सकती हैं। गौरव के अनुसार, सेल फोन पर बातें करते समय संयम बनाए रखना चाहिए और गुस्से से भी परहेज करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि
आपकी निजता का चीखता वर्णन आसपास बैठे या खड़े व्यक्ति को न सुहाए। भावनात्मक बातचीत होने पर अपने जज्बात पर काबू रखना चाहिए ताकि दूसरों के सामने शर्मिन्दगी की नौबत न आए।
उपासना कहती हैं कि अस्पतालों, विमान और संवेदनशील इलाकों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है इसलिए नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। वह कहती हैं कि अगर आपको
कुछ लोगों से मिलना है और उसी समय आपका जरूरी फोन आता है तो क्षमा मांगते हुए बात करने के लिए वहां से हटें।
राजधानी दिल्ली में एक फिनिशिंग स्कूल चला रहे मोहन सिंह कहते हैं कि एसएमएस भेज कर भी बातें कही जा सकती हैं लेकिन अनावश्यक एसएमएस बुरी बात है। मल्टीमीडिया एप्लीकेशनों जैसे
एमएमएस, वीडियो आदि का इस्तेमाल सोचसमझ कर करना चाहिए। इनका गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। वह कहते हैं कि मोबाइल फोन पर अगर एफएम रेडियो चलाया जा रहा है तो उसकी आवाज
धीमी रहनी चाहिए ताकि दूसरों को परेशानी न हो। ऐसे में इयरफोन का इस्तेमाल बेहतर होता है। गौरव कहते हैं कि वाहन चलाते समय सेल फोन का इस्तेमाल कतई नहीं करना चाहिए वर्ना आप अपने
साथ-साथ दूसरों की जान भी जोखिम में डाल सकते हैं। `मोबाइलोफोबिया? के साथ साथ इसके तौर तरीके पर भी जरा अमल कर लिया जाए तो इस नन्हे उपकरण से न आपको और न ही दूसरों को
झुंझलाहट होगी।
नन्हा सा सेलफोन ज्यादातर लोगों के लिए जीवन का जरूरी हिस्सा बन गया है। संचार की इस छोटे कद की बड़ी सी सुविधा से बड़े-बड़े काम बहुत आसानी से किए जा सकते हैं लेकिन सलीके से इनका
इस्तेमाल न करने पर यह काम की चीज आपको झुंझलाने के लिए मजबूर भी कर सकती है। दूरसंचार नियामक ट्राई के अनुसार मई 2010 के अन्त तक देश में सेलफोन उपभोक्ताओं की संख्या 61.753
करोड़ थी। अनुसंधान फर्म गार्टनर के आंकड़े कहते हैं कि वर्ष 2014 तक देश में सेलफोन कनेक्शनों की संख्या बढ़कर 99.3 करोड़ हो जाएगी। गार्टनर का यह भी अनुमान है कि भारत में इस साल के अन्त
तक मोबाइल फोनधारकों की संख्या 66 करोड़ पर पहुंच जाएगी।
भारत अपने पड़ोसी मुल्क चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सेल फोन बाजार है। बहरहाल, `मोबाइलोफोबिया? के इस बढ़ते चलन ने तौर-तरीकों की एक अलग संहिता तय करने की जरूरत का भी
एहसास कराया है। अगर ढंग नहीं बदले तो यह सेलफोन दुश्वारियों की वजह भी बन जाता है। एटीकेट स्पेशलिस्ट उपासना सिंह कहती हैं कि मीटिंग, अस्पताल, अदालत परिसर, थिएटर, सिनेमाघर,
पूजाघर, स्कूल आदि में सेलफोन की घंटी गहरा व्यवधान उत्पन्न करती है। इसलिए इन स्थानों पर जाने से पहले सेलफोन को वायसमेल पर या वाइब्रेशन पर रखना चाहिए ताकि किसी को व्यवधान न हो।
मीटिंग में सेल फोन को बन्द कर देना ही बेहतर होता है।
एक अन्य एटीकेट स्पेशलिस्ट गौरव दास कहते हैं कि सेलफोन पर कई लोग जोर-जोर से बातें करते हैं जिससे निजी या गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक हो सकती हैं। इसी तरह घरेलू बातें भी दूसरों को
मुस्कुराने के साथ-साथ बौखलाने पर मजबूर कर सकती हैं। गौरव के अनुसार, सेल फोन पर बातें करते समय संयम बनाए रखना चाहिए और गुस्से से भी परहेज करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि
आपकी निजता का चीखता वर्णन आसपास बैठे या खड़े व्यक्ति को न सुहाए। भावनात्मक बातचीत होने पर अपने जज्बात पर काबू रखना चाहिए ताकि दूसरों के सामने शर्मिन्दगी की नौबत न आए।
उपासना कहती हैं कि अस्पतालों, विमान और संवेदनशील इलाकों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाती है इसलिए नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। वह कहती हैं कि अगर आपको
कुछ लोगों से मिलना है और उसी समय आपका जरूरी फोन आता है तो क्षमा मांगते हुए बात करने के लिए वहां से हटें।
राजधानी दिल्ली में एक फिनिशिंग स्कूल चला रहे मोहन सिंह कहते हैं कि एसएमएस भेज कर भी बातें कही जा सकती हैं लेकिन अनावश्यक एसएमएस बुरी बात है। मल्टीमीडिया एप्लीकेशनों जैसे
एमएमएस, वीडियो आदि का इस्तेमाल सोचसमझ कर करना चाहिए। इनका गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। वह कहते हैं कि मोबाइल फोन पर अगर एफएम रेडियो चलाया जा रहा है तो उसकी आवाज
धीमी रहनी चाहिए ताकि दूसरों को परेशानी न हो। ऐसे में इयरफोन का इस्तेमाल बेहतर होता है। गौरव कहते हैं कि वाहन चलाते समय सेल फोन का इस्तेमाल कतई नहीं करना चाहिए वर्ना आप अपने
साथ-साथ दूसरों की जान भी जोखिम में डाल सकते हैं। `मोबाइलोफोबिया? के साथ साथ इसके तौर तरीके पर भी जरा अमल कर लिया जाए तो इस नन्हे उपकरण से न आपको और न ही दूसरों को
झुंझलाहट होगी।
क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान ही वो साधन है
क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान ही वो साधनबिना ऑक्सीजन के भी जीते हैं कुछ जीव
हमारा वायुमण्डल कई तरह की गैसों के मिश्रण से बना हुआ है। इनमें सबसे आवश्यक गैस ऑक्सीजन है, जो प्रत्येक जीव को जीने के लिए जरूरी है। बिना ऑक्सीजन के जीवन की कल्पना भी अभी तक नहीं की जा सकी। किन्तु यदि आपको पता चले कि पृथ्वी पर ही कुछ ऐसे जीव भी हैं जो बिना ऑक्सीजन के जीवित हैं तो आप आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकेंगे! दोस्तों, ऐसा ही कुछ उन वैज्ञानिकों के साथ घटित हुआ जब वे भूमध्यसागर की ला अटलांटा घाटी में काफी गहराई में खोज कर रहे थे।
बीएमसी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने बताया कि उन्होंने यहां ऑक्सीजन रहित वातावरण में किसी जीव के पाए जाने का कल्पना तक नहीं की थी। वैज्ञानिकों को अनुमान था कि यहां इतनी गहराई में उन्हें सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस ही प्राप्त होंगे किन्तु उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें यहां कुछ ऐसे जीव मिले जो न सिर्फ बिना ऑक्सीजन के जीवित थे बल्कि प्रजनन भी कर पा रहे थे। ऐसे जीवों को ढूंढ निकालने में जिन वैज्ञानिकों को सफलता हाथ लगी वे हैं इटली के मार्श पॉलीटैिक्नक विश्वविद्यालय के राबर्तो दानोवारो और उनके साथी दल के सदस्य।
भूमध्य सागर के तल में पाए गए ये अनोखे जीव दिखने में जेलीफिश की तरह हैं जिनका आकार एक मिलीमीटर से कम है तथा ये एक सुरक्षित कवच में लिपटे हुए हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें भूमध्यसागर के भीतर 10,000 फीट गहरे साल्टी बेसिन में खोजा है जहां ऑक्सीजन की सम्भावना बिल्कुल नहीं है। प्रोफेसर दानोवारो ने बताया कि इस खोज में ऐसी तीन प्रजातियां पाई गईं जिनमें से दो के अन्दर अण्डे भी थे, अर्थात ये जीव ऑक्सीजन के बिना प्रजनन भी कर पाने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जीवों की कोशिकाओं में माइटोकांिड्रया भी नहीं पाया गया जिसमें ऑक्सीजन से ऊर्जा पैदा की जाती है।
अब तक बिना ऑक्सीजन के जीवित रहने वाले जो जीव खोजे जा चुके थे वे एक कोशिकीय थे जबकि बिना ऑक्सीजन के जीवित रह सकने वाले ये बहुकोशिकीय जीव पहली बार देखे गए। प्रमुख वैज्ञानिक राबटोZ दानोवारो ने बताया कि भूमध्य सागर में काफी गहराई में जाने पर ऑक्सीजन नाममात्र को भी नहीं मिलता, इस खोज से वैज्ञानिक जीवों के पर्यावरण के साथ तालमेल बैठाने की क्षमता से आश्चर्यचकित थे।
खोज से प्राप्त इन जीवों को वैज्ञानिकों ने `लोरिसाीफेरांस? नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जीवों की खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पता लगाया जा सकेगा कि गहरे समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ने से पहले किस तरह के जीव रहा करते होंगे। अवश्य ही वैज्ञानिकों की इस खोज से पृथ्वी से परे अन्य ग्रहों पर जो जीवन के होने की आशंका जताई जा रही थीं उन्हें बल मिला है। अब निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि क्योंकि अन्य ग्रहों पर ऑक्सीजन नहीं है इसलिए जीवन नहीं है।
इस शोध को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि जाना जा सके आखिर और क्या-क्या परिस्थितियां हो सकती हैं जिनके बल पर भविष्य में बिना ऑक्सीजन के जीवित रहना सम्भव हो सकता है।
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 ...
है
हमारा वायुमण्डल कई तरह की गैसों के मिश्रण से बना हुआ है। इनमें सबसे आवश्यक गैस ऑक्सीजन है, जो प्रत्येक जीव को जीने के लिए जरूरी है। बिना ऑक्सीजन के जीवन की कल्पना भी अभी तक नहीं की जा सकी। किन्तु यदि आपको पता चले कि पृथ्वी पर ही कुछ ऐसे जीव भी हैं जो बिना ऑक्सीजन के जीवित हैं तो आप आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सकेंगे! दोस्तों, ऐसा ही कुछ उन वैज्ञानिकों के साथ घटित हुआ जब वे भूमध्यसागर की ला अटलांटा घाटी में काफी गहराई में खोज कर रहे थे।
बीएमसी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित इस शोध में वैज्ञानिकों ने बताया कि उन्होंने यहां ऑक्सीजन रहित वातावरण में किसी जीव के पाए जाने का कल्पना तक नहीं की थी। वैज्ञानिकों को अनुमान था कि यहां इतनी गहराई में उन्हें सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस ही प्राप्त होंगे किन्तु उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें यहां कुछ ऐसे जीव मिले जो न सिर्फ बिना ऑक्सीजन के जीवित थे बल्कि प्रजनन भी कर पा रहे थे। ऐसे जीवों को ढूंढ निकालने में जिन वैज्ञानिकों को सफलता हाथ लगी वे हैं इटली के मार्श पॉलीटैिक्नक विश्वविद्यालय के राबर्तो दानोवारो और उनके साथी दल के सदस्य।
भूमध्य सागर के तल में पाए गए ये अनोखे जीव दिखने में जेलीफिश की तरह हैं जिनका आकार एक मिलीमीटर से कम है तथा ये एक सुरक्षित कवच में लिपटे हुए हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें भूमध्यसागर के भीतर 10,000 फीट गहरे साल्टी बेसिन में खोजा है जहां ऑक्सीजन की सम्भावना बिल्कुल नहीं है। प्रोफेसर दानोवारो ने बताया कि इस खोज में ऐसी तीन प्रजातियां पाई गईं जिनमें से दो के अन्दर अण्डे भी थे, अर्थात ये जीव ऑक्सीजन के बिना प्रजनन भी कर पाने में सक्षम थे। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जीवों की कोशिकाओं में माइटोकांिड्रया भी नहीं पाया गया जिसमें ऑक्सीजन से ऊर्जा पैदा की जाती है।
अब तक बिना ऑक्सीजन के जीवित रहने वाले जो जीव खोजे जा चुके थे वे एक कोशिकीय थे जबकि बिना ऑक्सीजन के जीवित रह सकने वाले ये बहुकोशिकीय जीव पहली बार देखे गए। प्रमुख वैज्ञानिक राबटोZ दानोवारो ने बताया कि भूमध्य सागर में काफी गहराई में जाने पर ऑक्सीजन नाममात्र को भी नहीं मिलता, इस खोज से वैज्ञानिक जीवों के पर्यावरण के साथ तालमेल बैठाने की क्षमता से आश्चर्यचकित थे।
खोज से प्राप्त इन जीवों को वैज्ञानिकों ने `लोरिसाीफेरांस? नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन जीवों की खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पता लगाया जा सकेगा कि गहरे समुद्र में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ने से पहले किस तरह के जीव रहा करते होंगे। अवश्य ही वैज्ञानिकों की इस खोज से पृथ्वी से परे अन्य ग्रहों पर जो जीवन के होने की आशंका जताई जा रही थीं उन्हें बल मिला है। अब निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि क्योंकि अन्य ग्रहों पर ऑक्सीजन नहीं है इसलिए जीवन नहीं है।
इस शोध को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि जाना जा सके आखिर और क्या-क्या परिस्थितियां हो सकती हैं जिनके बल पर भविष्य में बिना ऑक्सीजन के जीवित रहना सम्भव हो सकता है।
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क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान ही वो साधन है
जुर्म की गुत्थयां सुलझाने में मदद करे क्रिमिनोलॉजी
क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान ही वो साधन है, जिसके जरिए पुलिस हत्या, बलात्कार और विस्फोट जैसे पेचीदा से पेचीदा अपराध की गुत्थी सुलझा लेती है। हालांकि नई तकनीक के आने से अपराध के
तरीकों में भी बदलाव आया है। लेकिन क्रिमिनोलॉजी एक ऐसा विज्ञान है, जो देर-सवेर बदमाशों को धर दबोचने में अहम भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं और इसमें बढ़ोत्तरी
भी हो रही है।
अगर आप चुनौती भरा कंरियर चाहते हैं तो इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए मुख्यतौर पर दो पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। उनमें स्नातक स्तर पर बीएससी फोरेंसिक
साइंस और बीए क्रिमिनोलॉजी है। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थी को विज्ञान विषय सहित बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है। कला संकाय वाले अभ्यर्थी को सिर्फ क्रिमिनोलॉजी में ही प्रवेश
मिलता है। इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम भी कराए जाते हैं। वहीं फोरेंसिक बैलेस्टिक में विशेषज्ञता के लिए भौतिक स्नातक, फोरेंसिक मेडिसीन के
लिए बीडीएस और क्रिमिनोलॉजी के लिए एलएलबी की डिग्री की आवश्यकता है। इन पाठ्यक्रमों में दाखिला प्रवेश परीक्षा या स्नातक के अंकों के आधार भी मिल जाता है। पाठ्यक्रम की अवधि स्नातक 3
वर्ष, स्नातकोत्तर दो वर्ष और डिप्लोमा का एक वर्ष का होता है।
क्रिमिनोलॉजी का क्षेत्र रोजगार की संभावनाओं से भरपूर है। पाठ्यक्रम पूरा करने वाले अभ्यर्थी को फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक तथा सुरक्षा और खुफिया विभाग में फोरेंसिक विशेषज्ञ के तौर पर काम
करने का अवसर मिलता है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों, शोध संस्थानों, बैकों और बीमा कंपनियों में भी काम के अवसर मौजूद हैं वहीं फोरेंसिक मेडिसीन विशेषज्ञों की लेक्चरर, रीडर और प्रोफेसर के
पदों पर नियुक्ति होती है।
ज्यादा जानकारी इन संस्थानों से हासिल कर सकते हैं-
- कर्नाटक विश्वविद्यालय, कर्नाटक।
- उप्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर।
- मद्रास विश्वविद्यालय, चेन्नई।
- मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल।
- पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला।
- लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
क्रिमिनोलॉजी यानी अपराध विज्ञान ही वो साधन है, जिसके जरिए पुलिस हत्या, बलात्कार और विस्फोट जैसे पेचीदा से पेचीदा अपराध की गुत्थी सुलझा लेती है। हालांकि नई तकनीक के आने से अपराध के
तरीकों में भी बदलाव आया है। लेकिन क्रिमिनोलॉजी एक ऐसा विज्ञान है, जो देर-सवेर बदमाशों को धर दबोचने में अहम भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं और इसमें बढ़ोत्तरी
भी हो रही है।
अगर आप चुनौती भरा कंरियर चाहते हैं तो इस क्षेत्र में अपनी किस्मत आजमा सकते हैं। इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए मुख्यतौर पर दो पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। उनमें स्नातक स्तर पर बीएससी फोरेंसिक
साइंस और बीए क्रिमिनोलॉजी है। इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के इच्छुक अभ्यर्थी को विज्ञान विषय सहित बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है। कला संकाय वाले अभ्यर्थी को सिर्फ क्रिमिनोलॉजी में ही प्रवेश
मिलता है। इसके अलावा विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम भी कराए जाते हैं। वहीं फोरेंसिक बैलेस्टिक में विशेषज्ञता के लिए भौतिक स्नातक, फोरेंसिक मेडिसीन के
लिए बीडीएस और क्रिमिनोलॉजी के लिए एलएलबी की डिग्री की आवश्यकता है। इन पाठ्यक्रमों में दाखिला प्रवेश परीक्षा या स्नातक के अंकों के आधार भी मिल जाता है। पाठ्यक्रम की अवधि स्नातक 3
वर्ष, स्नातकोत्तर दो वर्ष और डिप्लोमा का एक वर्ष का होता है।
क्रिमिनोलॉजी का क्षेत्र रोजगार की संभावनाओं से भरपूर है। पाठ्यक्रम पूरा करने वाले अभ्यर्थी को फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक तथा सुरक्षा और खुफिया विभाग में फोरेंसिक विशेषज्ञ के तौर पर काम
करने का अवसर मिलता है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेजों, शोध संस्थानों, बैकों और बीमा कंपनियों में भी काम के अवसर मौजूद हैं वहीं फोरेंसिक मेडिसीन विशेषज्ञों की लेक्चरर, रीडर और प्रोफेसर के
पदों पर नियुक्ति होती है।
ज्यादा जानकारी इन संस्थानों से हासिल कर सकते हैं-
- कर्नाटक विश्वविद्यालय, कर्नाटक।
- उप्कल विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर।
- मद्रास विश्वविद्यालय, चेन्नई।
- मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल।
- पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला।
- लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
भारतीय सॉपऊटवेयर उद्योग के सुदृढीक़रण के लिए एफओएसएस
भारतीय सॉपऊटवेयर उद्योग के सुदृढीक़रण के लिए एफओएसएस
भारतीय सॉपऊटवेयर उद्योग के सुदृढीक़रण और डिजीटल खाई को पाटने के लिए फ्री एंड ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर (एफओएसएस) के सर्वांगीण उन्नयन के लिए एक पारितंत्र का निर्माण करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सी-डैक और एयू-केबीसी रिसर्च सेन्टर, चेन्नई में फ्री ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर के लिए नेशनल रिसोर्स सेंटर (एनआरसीएफओएसएस) स्थापित किया गया है जो देश में एफओएसएस समुदाय को डिजाइन, विकास, प्रशिक्षण और सहयोगी सेवाएं प्रदान करेगा और मुक्त संसाधन भंडार (ओपन सोर्स पूल) में योगदान करके वैश्विक एफओएसएस पारितंत्र को भी मजबूत बनाएगा। (www.nrcfoss.org.in)
देश में विकसित संचालन प्रणाली
एनआरसीएफओएसएस ने भारतीय भाषा के सहयोग से जीएनयू लाइनक्स आधारित भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सॉल्यूशंस संचार प्रणाली (बीओएसएस) देश में विकसित किया है। बीओएसएस डेस्कटॉप वर्जन 3.1 और बीओएसएस सर्वर वर्जन 1.0 को उपयोग के लिए जारी कर दिया गया है। वर्तमान में बीओएसएस डेस्कटॉप वर्जन 18 भारतीय भाषाओं को सहयोग देता है--असमी, बंगाली, बोडो, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू और उर्दू। बीओएसएस में मल्टीमीडिया सहयोग, कैमरे और स्कैनरों, यूएसबी उपकरण, ऑन-लाइन डिक्शनरी, इंटरनेट उपकरण और मोबाइल इंटरनेट उपकरणों इत्यादि से जोड़ने के लिए सहयोग जैसे फीचर हैं। बीओएसएस को http://www.bosslinux.in से डाउनलोड करके लगाया जा सकता है। बीओएसएस के डेस्कटॉप और सर्वर दोनों वर्जनों ने 'द लाइनक्स फाउंडेशन से लाइनक्स स्टैंडर्ड बेस का प्रमाण पत्र प्राप्त किया है जो यह सुनिश्चित करता है कि एलएसबी (लाइनक्स स्टैंडर्ड बेस) से प्रमाणित प्रत्येक उपकरण बीओएसएस पर उचित रूप से कार्य करेगा। बीओएसएस ने सुरक्षा लेखा-जोखा, क्रिप्टोग्राफिक सहयोग, ऑबजेक्ट के पुनर्प्रयोग की सुविधा, यूजर डाटा प्रोटेक्शन (प्रयोगकर्ता डाटा संरक्षण), पहचान और प्रमाणीकरण, सुरक्षा प्रबंधन इत्यादि जैसे सुरक्षा फीचरों को शामिल किया है।'
तकनीकी सहयोग प्रदान करना
प्रयोगकर्ताओं को तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए देशभर में बीओएसएस सहयोग केन्द्रों का नेटवर्क स्थापित किया जा रहा है। अभी तक सी-डैक के सभी केन्द्रों और डीआईटी, दिल्ली समेत 13 ऐसे केन्द्र कार्यरत हैं। टेलीफोन, ई-मेल और वेब पर सहयोग प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय हैल्प डेस्क भी स्थापित किया गया हे। 2 टेरा बाइट्स की क्षमता और 8 एमबीपीएस के संपर्क के साथ सी-डैक चेन्नई में डाटा केन्द्र स्थापित किया गया है जहां प्रयोगकर्ताओं और विकासकर्ताओं की सुविधा के लिए बीओएसएस का भंडार रखा गया है। अभी तक विभिन्न मंचों और समारोहों में बीओएसएस के 80,000 से भी अधिक डीवीडी नि:शुल्क रूप से वितरित किए गए हैं।
स्वीकार किए जाने के लिए प्रयास
एनआरसीएफओएसएस ने प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से और सहयोग प्रदान करके जागरूकता पैदा करके देश में बीओएसएस को आत्मसात करने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं।
ई-गवर्नेंस के कार्यों के लिए छत्तीसगढ आैर केरल में बीओएसएस को लगाया गया है। एनआईसी द्वारा विकसित एवं संचालित ई-गवर्नेंस कार्यों में देशभर में बीओएसएस की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एनआईसी) के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया गया है। पंजाब राज्य सरकार एवं शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत लगभग 5000 स्कूलों में बीओएसएस को तैनात कर रही है। भारतीय नौसेना ने अपने कार्यालय के कार्यों के लिए बीओएसएस को स्वीकार किया है। स्कूली बच्चों की ओर लक्षित एजु बीओएसएस नामक बीओएसएस का एक शिक्षण संस्करण लाया गया है, जिसे केरल में राज्य के आईटी @ स्कूल्स कार्यक्रमों के माध्यम से अग्रणी आधार पर लागू किया जा रहा है।
आगे बढाने की उपलब्धता
एनआरसीएफओएसएस ने एफओएसएस सक्षम मानवश्रम की उपलब्धता को बढाने के लिए नियमित शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और समारोहों का आयोजन करते हुए अनेक कदम उठाए हैं। एनआरसीएफओएसएस विभिन्न विश्विविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से बातचीत कर रहा है ताकि पाठयक्रम तैयार करने में, पाठयक्रम सामग्री विकसित करने में और शिक्षकों का प्रशिक्षण आयोजन करने में उनकी मदद कर सके। एफओएसएस के विषयों को अन्य विश्वविद्यालय कोयम्बटूर में केन्द्रीय पेपर के रूप में और अनेक अन्य विश्वविद्यालयों और स्वायत्त संस्थानों में चयन किए जाने वाले पेपरों के रूप में शुरू किया गया है। अन्य कॉलेज विश्वविद्यालय अभी अपने पाठयक्रम में एफओएसएस के विषयों को चयनित विषयों के रूप में शुरू करने की प्रक्रिया में हैं। एनआरसीएफओएसएस की चरण-2 परियोजना को सी-डैक (चेन्नई, हैदराबाद, मुम्बई, दिल्ली), आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी मद्रास और एयू-केबीसी रिसर्च सेंटर, चेन्नई के साथ सामूहिक रूप में शुरू किया गया है। चरण-2 परियोजना को एफओएसएस प्रमाणीकरण और एफओएसएस भंडारग्रहों की स्थापना, ई-लर्निंग उपकरणों, एपओएस के प्रभाव का विश्लेषण, एफओएसएस के उपकरणों को अंगीकृत करना, मोबाइल उपयोगों, सेवा के रूप में सॉपऊटवेयर (एसएएएस), कम्पाइलरों, संचालन तंत्रों के रूप में एफओएसएस की खास प्रौद्योगिकियों और समाधानों पर अनुसंधान व विकास के व्यापक उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया है। इस परियोजना के तहत सी-डैक हैदराबाद में ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर में प्रमाणीकरण पाठयक्रम प्रस्तुत करने और मानकों को लागू करने पर ध्यान केन्द्रित करते हुए एक ओपन सोर्स वाक-इन-लर्निंग सॉल्यूशंस लेबोरेटरी स्थापित की गई है। इस परियोजना के तहत आईआईटी बॉम्बे में जीसीसी (जीएनयू संकलन संग्रह) में वृध्दि की गई है। यह परियोजना देश में एफओएसएस को तीव्र गति से अंगीकृत करने के लिए एक दृढ पारितंत्र के निर्माण में मदद करेगी।
सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग से साभार
Date: 01-09-2010
1 2
भारतीय सॉपऊटवेयर उद्योग के सुदृढीक़रण और डिजीटल खाई को पाटने के लिए फ्री एंड ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर (एफओएसएस) के सर्वांगीण उन्नयन के लिए एक पारितंत्र का निर्माण करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सी-डैक और एयू-केबीसी रिसर्च सेन्टर, चेन्नई में फ्री ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर के लिए नेशनल रिसोर्स सेंटर (एनआरसीएफओएसएस) स्थापित किया गया है जो देश में एफओएसएस समुदाय को डिजाइन, विकास, प्रशिक्षण और सहयोगी सेवाएं प्रदान करेगा और मुक्त संसाधन भंडार (ओपन सोर्स पूल) में योगदान करके वैश्विक एफओएसएस पारितंत्र को भी मजबूत बनाएगा। (www.nrcfoss.org.in)
देश में विकसित संचालन प्रणाली
एनआरसीएफओएसएस ने भारतीय भाषा के सहयोग से जीएनयू लाइनक्स आधारित भारत ऑपरेटिंग सिस्टम सॉल्यूशंस संचार प्रणाली (बीओएसएस) देश में विकसित किया है। बीओएसएस डेस्कटॉप वर्जन 3.1 और बीओएसएस सर्वर वर्जन 1.0 को उपयोग के लिए जारी कर दिया गया है। वर्तमान में बीओएसएस डेस्कटॉप वर्जन 18 भारतीय भाषाओं को सहयोग देता है--असमी, बंगाली, बोडो, गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू और उर्दू। बीओएसएस में मल्टीमीडिया सहयोग, कैमरे और स्कैनरों, यूएसबी उपकरण, ऑन-लाइन डिक्शनरी, इंटरनेट उपकरण और मोबाइल इंटरनेट उपकरणों इत्यादि से जोड़ने के लिए सहयोग जैसे फीचर हैं। बीओएसएस को http://www.bosslinux.in से डाउनलोड करके लगाया जा सकता है। बीओएसएस के डेस्कटॉप और सर्वर दोनों वर्जनों ने 'द लाइनक्स फाउंडेशन से लाइनक्स स्टैंडर्ड बेस का प्रमाण पत्र प्राप्त किया है जो यह सुनिश्चित करता है कि एलएसबी (लाइनक्स स्टैंडर्ड बेस) से प्रमाणित प्रत्येक उपकरण बीओएसएस पर उचित रूप से कार्य करेगा। बीओएसएस ने सुरक्षा लेखा-जोखा, क्रिप्टोग्राफिक सहयोग, ऑबजेक्ट के पुनर्प्रयोग की सुविधा, यूजर डाटा प्रोटेक्शन (प्रयोगकर्ता डाटा संरक्षण), पहचान और प्रमाणीकरण, सुरक्षा प्रबंधन इत्यादि जैसे सुरक्षा फीचरों को शामिल किया है।'
तकनीकी सहयोग प्रदान करना
प्रयोगकर्ताओं को तकनीकी सहयोग प्रदान करने के लिए देशभर में बीओएसएस सहयोग केन्द्रों का नेटवर्क स्थापित किया जा रहा है। अभी तक सी-डैक के सभी केन्द्रों और डीआईटी, दिल्ली समेत 13 ऐसे केन्द्र कार्यरत हैं। टेलीफोन, ई-मेल और वेब पर सहयोग प्रदान करने के लिए एक राष्ट्रीय हैल्प डेस्क भी स्थापित किया गया हे। 2 टेरा बाइट्स की क्षमता और 8 एमबीपीएस के संपर्क के साथ सी-डैक चेन्नई में डाटा केन्द्र स्थापित किया गया है जहां प्रयोगकर्ताओं और विकासकर्ताओं की सुविधा के लिए बीओएसएस का भंडार रखा गया है। अभी तक विभिन्न मंचों और समारोहों में बीओएसएस के 80,000 से भी अधिक डीवीडी नि:शुल्क रूप से वितरित किए गए हैं।
स्वीकार किए जाने के लिए प्रयास
एनआरसीएफओएसएस ने प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से और सहयोग प्रदान करके जागरूकता पैदा करके देश में बीओएसएस को आत्मसात करने के लिए व्यापक प्रयास किए हैं।
ई-गवर्नेंस के कार्यों के लिए छत्तीसगढ आैर केरल में बीओएसएस को लगाया गया है। एनआईसी द्वारा विकसित एवं संचालित ई-गवर्नेंस कार्यों में देशभर में बीओएसएस की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एनआईसी) के साथ एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया गया है। पंजाब राज्य सरकार एवं शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत लगभग 5000 स्कूलों में बीओएसएस को तैनात कर रही है। भारतीय नौसेना ने अपने कार्यालय के कार्यों के लिए बीओएसएस को स्वीकार किया है। स्कूली बच्चों की ओर लक्षित एजु बीओएसएस नामक बीओएसएस का एक शिक्षण संस्करण लाया गया है, जिसे केरल में राज्य के आईटी @ स्कूल्स कार्यक्रमों के माध्यम से अग्रणी आधार पर लागू किया जा रहा है।
आगे बढाने की उपलब्धता
एनआरसीएफओएसएस ने एफओएसएस सक्षम मानवश्रम की उपलब्धता को बढाने के लिए नियमित शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और समारोहों का आयोजन करते हुए अनेक कदम उठाए हैं। एनआरसीएफओएसएस विभिन्न विश्विविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से बातचीत कर रहा है ताकि पाठयक्रम तैयार करने में, पाठयक्रम सामग्री विकसित करने में और शिक्षकों का प्रशिक्षण आयोजन करने में उनकी मदद कर सके। एफओएसएस के विषयों को अन्य विश्वविद्यालय कोयम्बटूर में केन्द्रीय पेपर के रूप में और अनेक अन्य विश्वविद्यालयों और स्वायत्त संस्थानों में चयन किए जाने वाले पेपरों के रूप में शुरू किया गया है। अन्य कॉलेज विश्वविद्यालय अभी अपने पाठयक्रम में एफओएसएस के विषयों को चयनित विषयों के रूप में शुरू करने की प्रक्रिया में हैं। एनआरसीएफओएसएस की चरण-2 परियोजना को सी-डैक (चेन्नई, हैदराबाद, मुम्बई, दिल्ली), आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी मद्रास और एयू-केबीसी रिसर्च सेंटर, चेन्नई के साथ सामूहिक रूप में शुरू किया गया है। चरण-2 परियोजना को एफओएसएस प्रमाणीकरण और एफओएसएस भंडारग्रहों की स्थापना, ई-लर्निंग उपकरणों, एपओएस के प्रभाव का विश्लेषण, एफओएसएस के उपकरणों को अंगीकृत करना, मोबाइल उपयोगों, सेवा के रूप में सॉपऊटवेयर (एसएएएस), कम्पाइलरों, संचालन तंत्रों के रूप में एफओएसएस की खास प्रौद्योगिकियों और समाधानों पर अनुसंधान व विकास के व्यापक उद्देश्यों के साथ शुरू किया गया है। इस परियोजना के तहत सी-डैक हैदराबाद में ओपन सोर्स सॉपऊटवेयर में प्रमाणीकरण पाठयक्रम प्रस्तुत करने और मानकों को लागू करने पर ध्यान केन्द्रित करते हुए एक ओपन सोर्स वाक-इन-लर्निंग सॉल्यूशंस लेबोरेटरी स्थापित की गई है। इस परियोजना के तहत आईआईटी बॉम्बे में जीसीसी (जीएनयू संकलन संग्रह) में वृध्दि की गई है। यह परियोजना देश में एफओएसएस को तीव्र गति से अंगीकृत करने के लिए एक दृढ पारितंत्र के निर्माण में मदद करेगी।
सूचना और प्रौद्योगिकी विभाग से साभार
Date: 01-09-2010
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महात्मा गांधी नरेगा के अधीन जनता के सशक्तीकरण के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी
महात्मा गांधी नरेगा के अधीन जनता के सशक्तीकरण के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी
*अतुल के तिवारी
महात्मा गांधी नरेगा ग्रामीण भारत के भविष्य को संवारने के रास्ते में एक दूरदर्शितापूर्ण औजार की तरह है जिसे अब अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से सुसज्जित किया जा रहा है। इसका श्रेय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आई सी टी) के इस्तेमाल को जाता है। महात्मा गांधी नरेगा में आईसीटी का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करेगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंदों और गरीबों तक इसका लाभ पहुंचे, जो पारदर्शिता की दिशा में एक अन्य कदम है। इसके लिए विभिन्न हितधारकों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर परामर्श की प्रक्रिया जोर पकड़ रही है और योजना आयोग, भारतीय सार्वभौमिक पहचान प्राधिकरण (यूआईएडीएआई) और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने इस अभियान को बढ़ावा दिया है। इसके लिए ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. सी.पी जोशी पथप्रदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और इसकी प्रक्रियाओं का प्रभावकारी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए दृढ़संकल्प हैं।
अब महात्मा गांधी नरेगा में सार्वजनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने, पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही उन गतिविधियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है जिनसे हाथ में लिए गए कार्यों की उत्पादकतापूर्ण संभावनाओं का लाभ प्राप्त किया जा सके ताकि यह धारणीय विकास के लिए एक मंच बन सके।
जमीनी स्तर पर पारदर्शिता लागू करने के क्रम में ग्रामीण विकास मंत्रालय आईसीटी उपकरण, विशेषकर बायोमेट्रिक और यूआईएडीएआई के साथ उसे जोड़ने का विचार कर रहा है। इसके बल पर कार्य स्थल पर बायोमेट्रिक उपस्थिति की शुरूआत हो और कुल मिलाकर महात्मा गांधी नरेगा की वितरण प्रणाली के क्रियान्वयन में सुधार हो सके, जिसमें पंजीकरण, कार्य की मांग, तिथिवार प्राप्तियों को जारी करना, कार्य का आबंटन, जीपीएस के साथ कार्यस्थल पर उपस्थिति, कार्य का मापन और पारिश्रमिक का भुगतान शामिल हो।
क्षेत्रीय परीक्षण के लिए और बायोमेट्रिक आधारित आईसीटी से लैस कामगारों के लेन-देनों को तैयार करने के लिए आंध्र प्रदेश (रंगारेड्डी और विशाखापत्तानम), केरल (पलक्कड और वायानाड), ओड़िशा (कटक और मयूरभंज), उत्तर प्रदेश (उन्नाव) और राजस्थान (भीलवाड़ा) में शीर्ष पहलें की गईं। तमिलनाडु (कुड्डालोर) में एक अन्य शीर्ष परियोजना लागू की गई है जो कम लागत वाले एटीएम हैं, जिनमें उंगली के निशान की पहचान करने और स्थानीय भाषा को परखने की क्षमता है। ये शीर्ष परियोजनाएं पंजीकरण से लेकर पारिश्रमिक भुगतान और डाटा रखने तक बायोमेट्रिक क्षमता वाले आईसीटी अप्लीकेशनों के इस्तेमाल की व्यवहार्यता को प्रदर्शित करती हैं।
रोल आउट प्लान
शीर्ष परियोजनाओं से प्राप्त फीडबैक के आधार पर एक राष्ट्रव्यापी रोल आउट प्लान तैयार किया गया है, जिसमें बायोमेट्रिक डाटाबेस की राष्ट्रव्यापी शुरूआत और कुल मिलाकर वितरण प्रणाली में सुधार के लिए आईटीसी उपकरण का इस्तेमाल शामिल है।
कार्यस्थल पर बायोमेट्रिक और जीपीएस-युक्त आईसीटी उपकरणों के इस्तेमाल करने का प्राथमिक उद्देश्य फर्जी कामगारों को हटाना और जॉब कार्डों की समस्या को स्थानीय नेतृत्व की सुविधानुसार हल करना है। बायोमेट्रिक डाटा के साथ एमआईएस को जोड़ने से हमें लंबे समय तक सही समय में मांग तक पहुंचने, तिथिवार प्राप्तियां तैयार करने, कार्य का आबंटन करने के साथ ही मापन और भुगतान के संदर्भ में देरी में कमी लाने में मदद मिलेगी।
इसके लिए महात्मा गांधी नरेगा के सभी कामगारों का बायोमेट्रिक डाटा संग्रह करना और राज्य डाटा भंडार तैयार करना आवश्यक होगा ताकि कार्यस्थल पर लैप टॉप जैसे यंत्र के माध्यम से जीपीआरएस, सीडीएमए, पीएसटीएन अथवा इंटरनेट संपर्क के द्वारा महात्मा गांधी नरेगा के कामगारों की तत्क्षण उपस्थिति का सत्यापन किया जा सके। इसके माध्यम से मस्टर रोल के रिकॉर्डों और महात्मा गांधी नरेगा के वेब आधारित एमआईएस को अद्यतन भी किया जा सकता है और माइक्रो-मोबाइल एटीएम उपकरण के साथ बैंकों के साथ व्यावसायिक संवाद के संदर्भ में भी मदद की जा सकती है ताकि कामगारों को उनके घर पर पारिश्रमिक का भुगतान किया जा सके।
आईसीटी का इस्तेमाल
आईसीटी से लैस प्रणाली के बल पर पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी। इससे मापन और भुगतान में देरी को घटाने में भी काफी मदद मिलेगी। इसके अलावा, इस प्रकार तैयार किये गये डाटा का इस्तेमाल यूआईडीएआई द्वारा यूआईडी नंबर तैयार करने के लिए भी किया जा सकता है। बैंकों और डाकघरों के द्वारा भी व्यावसायिक पत्राचार के प्रारूप के माध्यम से महात्मा गांधी नरेगा खाते के संदर्भ में इसका इस्तेमाल हो सकेगा।
बड़े पैमाने पर संचालनों, विभिन्न सेवाओं तक पहुंच की सीमाओं और सूचना की मात्राओं के पारदर्शी तरीके से संचालन संबंधी जरूरतों के कारण आईसीटी का इस्तेमाल यहां यथोचित माना जा रहा है। आईसीटी सुविधाओं के द्वारा ग्राम पंचायत और ब्लॉक कार्यालय दोनों के कार्यक्रम अधिकारी की सहायता करने के साथ ही सूचना तक सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करने के साथ ही ऑनलाइन लेन-देन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
आईसीटी प्रौद्योगिकियों के लाभ
ग्राम पंचायत तात्कालिक प्रभाव से आईसीटी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल महात्मा गांधी नरेगा के लिए समयानुसार सभी प्रकार के लेन-देनों के लिए कर सकती हैं। आईसीटी लैस समाधानों से हमें अंतिम दौर तक संपर्कता प्राप्त होती है और जमीनीं स्तर पर अभिनवता के बल पर कामगारों को उनके अधिकारों तक पहुंच कायम कराने के साथ ही क्रियान्वयन एजेंसी को उत्तरदायी बनाया जा सकता है।
महात्मा गांधी नरेगा एक इस प्रकार की सामाजिक सुरक्षा का विधान है जो मांग होने पर रोजगार के अधिकार को सुनिश्चित करता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार को एक वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार प्रदान करके उनकी जीविका सुरक्षा को बढ़ाना है। फरवरी, 2006 में अपनी शुरूआत से लेकर अब इसकी पहुंच 619 जिलों, 6400 ब्लॉकों, छह लाख गांवों और लगभग 2.35 लाख ग्राम पंचायतों तक हो गई हैं। वर्ष 2006 में अपनी शुरूआत से लेकर अब तक 777 करोड़ श्रम दिवसों का सृजन हो चुका है जिसमें महिलाओं का आधा हिस्सा है और अनुसूचित जाति।#जनजाति का हिस्सा आधे से ज्यादा है। इसके अधीन 95446 करोड़ रूपये के कुल व्यय का 68 प्रतिशत भाग मजदूरी पर खर्च किया जाता है। बैंकों#डाकघरों में इसके कामगारों के 9.19 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं, जिससे गरीब लोगों के बीच बचत को बढ़ावा मिला है। महात्मा गांधी नरेगा के अधीन 45 लाख से भी अधिक कार्यों को पूरा किया गया है जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक कार्य जल संरक्षण पर आधारित हैं।
महात्मा गांधी नरेगा के क्रियान्वयन में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी को शामिल करने से इसमें पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी।
(पसूका विशेष लेख)
*निदेशक (मीडिया और संचार),
पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली
Date: 01-09-2010
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*अतुल के तिवारी
महात्मा गांधी नरेगा ग्रामीण भारत के भविष्य को संवारने के रास्ते में एक दूरदर्शितापूर्ण औजार की तरह है जिसे अब अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी से सुसज्जित किया जा रहा है। इसका श्रेय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आई सी टी) के इस्तेमाल को जाता है। महात्मा गांधी नरेगा में आईसीटी का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करेगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंदों और गरीबों तक इसका लाभ पहुंचे, जो पारदर्शिता की दिशा में एक अन्य कदम है। इसके लिए विभिन्न हितधारकों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर परामर्श की प्रक्रिया जोर पकड़ रही है और योजना आयोग, भारतीय सार्वभौमिक पहचान प्राधिकरण (यूआईएडीएआई) और राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने इस अभियान को बढ़ावा दिया है। इसके लिए ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. सी.पी जोशी पथप्रदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं जो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और इसकी प्रक्रियाओं का प्रभावकारी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए दृढ़संकल्प हैं।
अब महात्मा गांधी नरेगा में सार्वजनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने, पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही उन गतिविधियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है जिनसे हाथ में लिए गए कार्यों की उत्पादकतापूर्ण संभावनाओं का लाभ प्राप्त किया जा सके ताकि यह धारणीय विकास के लिए एक मंच बन सके।
जमीनी स्तर पर पारदर्शिता लागू करने के क्रम में ग्रामीण विकास मंत्रालय आईसीटी उपकरण, विशेषकर बायोमेट्रिक और यूआईएडीएआई के साथ उसे जोड़ने का विचार कर रहा है। इसके बल पर कार्य स्थल पर बायोमेट्रिक उपस्थिति की शुरूआत हो और कुल मिलाकर महात्मा गांधी नरेगा की वितरण प्रणाली के क्रियान्वयन में सुधार हो सके, जिसमें पंजीकरण, कार्य की मांग, तिथिवार प्राप्तियों को जारी करना, कार्य का आबंटन, जीपीएस के साथ कार्यस्थल पर उपस्थिति, कार्य का मापन और पारिश्रमिक का भुगतान शामिल हो।
क्षेत्रीय परीक्षण के लिए और बायोमेट्रिक आधारित आईसीटी से लैस कामगारों के लेन-देनों को तैयार करने के लिए आंध्र प्रदेश (रंगारेड्डी और विशाखापत्तानम), केरल (पलक्कड और वायानाड), ओड़िशा (कटक और मयूरभंज), उत्तर प्रदेश (उन्नाव) और राजस्थान (भीलवाड़ा) में शीर्ष पहलें की गईं। तमिलनाडु (कुड्डालोर) में एक अन्य शीर्ष परियोजना लागू की गई है जो कम लागत वाले एटीएम हैं, जिनमें उंगली के निशान की पहचान करने और स्थानीय भाषा को परखने की क्षमता है। ये शीर्ष परियोजनाएं पंजीकरण से लेकर पारिश्रमिक भुगतान और डाटा रखने तक बायोमेट्रिक क्षमता वाले आईसीटी अप्लीकेशनों के इस्तेमाल की व्यवहार्यता को प्रदर्शित करती हैं।
रोल आउट प्लान
शीर्ष परियोजनाओं से प्राप्त फीडबैक के आधार पर एक राष्ट्रव्यापी रोल आउट प्लान तैयार किया गया है, जिसमें बायोमेट्रिक डाटाबेस की राष्ट्रव्यापी शुरूआत और कुल मिलाकर वितरण प्रणाली में सुधार के लिए आईटीसी उपकरण का इस्तेमाल शामिल है।
कार्यस्थल पर बायोमेट्रिक और जीपीएस-युक्त आईसीटी उपकरणों के इस्तेमाल करने का प्राथमिक उद्देश्य फर्जी कामगारों को हटाना और जॉब कार्डों की समस्या को स्थानीय नेतृत्व की सुविधानुसार हल करना है। बायोमेट्रिक डाटा के साथ एमआईएस को जोड़ने से हमें लंबे समय तक सही समय में मांग तक पहुंचने, तिथिवार प्राप्तियां तैयार करने, कार्य का आबंटन करने के साथ ही मापन और भुगतान के संदर्भ में देरी में कमी लाने में मदद मिलेगी।
इसके लिए महात्मा गांधी नरेगा के सभी कामगारों का बायोमेट्रिक डाटा संग्रह करना और राज्य डाटा भंडार तैयार करना आवश्यक होगा ताकि कार्यस्थल पर लैप टॉप जैसे यंत्र के माध्यम से जीपीआरएस, सीडीएमए, पीएसटीएन अथवा इंटरनेट संपर्क के द्वारा महात्मा गांधी नरेगा के कामगारों की तत्क्षण उपस्थिति का सत्यापन किया जा सके। इसके माध्यम से मस्टर रोल के रिकॉर्डों और महात्मा गांधी नरेगा के वेब आधारित एमआईएस को अद्यतन भी किया जा सकता है और माइक्रो-मोबाइल एटीएम उपकरण के साथ बैंकों के साथ व्यावसायिक संवाद के संदर्भ में भी मदद की जा सकती है ताकि कामगारों को उनके घर पर पारिश्रमिक का भुगतान किया जा सके।
आईसीटी का इस्तेमाल
आईसीटी से लैस प्रणाली के बल पर पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी। इससे मापन और भुगतान में देरी को घटाने में भी काफी मदद मिलेगी। इसके अलावा, इस प्रकार तैयार किये गये डाटा का इस्तेमाल यूआईडीएआई द्वारा यूआईडी नंबर तैयार करने के लिए भी किया जा सकता है। बैंकों और डाकघरों के द्वारा भी व्यावसायिक पत्राचार के प्रारूप के माध्यम से महात्मा गांधी नरेगा खाते के संदर्भ में इसका इस्तेमाल हो सकेगा।
बड़े पैमाने पर संचालनों, विभिन्न सेवाओं तक पहुंच की सीमाओं और सूचना की मात्राओं के पारदर्शी तरीके से संचालन संबंधी जरूरतों के कारण आईसीटी का इस्तेमाल यहां यथोचित माना जा रहा है। आईसीटी सुविधाओं के द्वारा ग्राम पंचायत और ब्लॉक कार्यालय दोनों के कार्यक्रम अधिकारी की सहायता करने के साथ ही सूचना तक सार्वजनिक पहुंच सुनिश्चित करने के साथ ही ऑनलाइन लेन-देन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
आईसीटी प्रौद्योगिकियों के लाभ
ग्राम पंचायत तात्कालिक प्रभाव से आईसीटी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल महात्मा गांधी नरेगा के लिए समयानुसार सभी प्रकार के लेन-देनों के लिए कर सकती हैं। आईसीटी लैस समाधानों से हमें अंतिम दौर तक संपर्कता प्राप्त होती है और जमीनीं स्तर पर अभिनवता के बल पर कामगारों को उनके अधिकारों तक पहुंच कायम कराने के साथ ही क्रियान्वयन एजेंसी को उत्तरदायी बनाया जा सकता है।
महात्मा गांधी नरेगा एक इस प्रकार की सामाजिक सुरक्षा का विधान है जो मांग होने पर रोजगार के अधिकार को सुनिश्चित करता है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार को एक वर्ष में न्यूनतम 100 दिनों का रोजगार प्रदान करके उनकी जीविका सुरक्षा को बढ़ाना है। फरवरी, 2006 में अपनी शुरूआत से लेकर अब इसकी पहुंच 619 जिलों, 6400 ब्लॉकों, छह लाख गांवों और लगभग 2.35 लाख ग्राम पंचायतों तक हो गई हैं। वर्ष 2006 में अपनी शुरूआत से लेकर अब तक 777 करोड़ श्रम दिवसों का सृजन हो चुका है जिसमें महिलाओं का आधा हिस्सा है और अनुसूचित जाति।#जनजाति का हिस्सा आधे से ज्यादा है। इसके अधीन 95446 करोड़ रूपये के कुल व्यय का 68 प्रतिशत भाग मजदूरी पर खर्च किया जाता है। बैंकों#डाकघरों में इसके कामगारों के 9.19 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं, जिससे गरीब लोगों के बीच बचत को बढ़ावा मिला है। महात्मा गांधी नरेगा के अधीन 45 लाख से भी अधिक कार्यों को पूरा किया गया है जिनमें से 50 प्रतिशत से अधिक कार्य जल संरक्षण पर आधारित हैं।
महात्मा गांधी नरेगा के क्रियान्वयन में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी को शामिल करने से इसमें पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलेगी।
(पसूका विशेष लेख)
*निदेशक (मीडिया और संचार),
पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली
Date: 01-09-2010
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