Tuesday, December 28, 2010

टीएन नैनन को सर्वसम्मति से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड के टीएन नैनन को सर्वसम्मति से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। एडिटर्स गिल्ड की सालाना आम सभा में इंडियन एक्सप्रेस के कोमी कपूर को महासचिव चुना गया, जबकि नई दुनिया के सुरेश बाफना कोषाध्यक्ष चुने गए। सभा में मौजूद सदस्यों की ओर से बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने गिल्ड की पिछली टीम राजदीप सरदेसाई, कोमी कपूर व रोहित बंसल का शुक्रिया अदा किया।
आमसभा में इस बात पर सहमति बनी कि पेड न्यूज के खिलाफ गिल्ड के सतत अभियान के हिस्से के तौर पर उन सभी गिल्ड सदस्यों के नाम गिल्ड की वेबसाइट पर 1 फरवरी, 2011 तक डाल दिए जाएंगे, जो इस खतरनाक प्रवृत्ति में शामिल न होने का हस्ताक्षरित हलफनामा देकर यह प्रतिज्ञा करेंगे।
सदस्यों का मानना था कि वेबसाइट पर नाम डालने से पहले सदस्यों को एक माह का वक्त देकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सभी को हलफनामा पर हस्ताक्षर के लिए गिल्ड का सकरुलर मिल गया है। गिल्ड की आमसभा में इस बात पर खास चिंता जाहिर की गई कि राडिया टेप में जिस तरह के खुलासे हुए हैं, उनमें कुछ प्रतिष्ठित संपादकों ने पत्रकारिता की श्रेष्ठ परंपराओं का ख्याल नहीं रखा। इस घटना से जन-सामान्य के बीच मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। सभी संपादकों से अपील की गई है कि वे मीडिया की गरिमा और सत्यनिष्ठा का हमेशा ख्याल रखें। साभार : भास्‍कर
 

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा : पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैर-लोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी मानती है कि बिनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।
जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकीलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्‍ट्रम जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे, जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।
बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य, जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून, जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया, वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे, बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा. सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।
हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात, कि वह बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं, के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।
ऐसे में हम इस बात कोन्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा : पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैर-लोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी मानती है कि बिनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।
जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकीलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्‍ट्रम जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे, जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।
बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य, जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून, जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया, वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे, बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा. सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।
हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात, कि वह बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं, के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।
ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी की तरफ से राजीव यादव द्वारा जारी कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी की तरफ से राजीव यादव द्वारा जारी

Saturday, December 18, 2010

bhopal news reporter

new news for tibat ferdam staragal

attack tager on zipsy

भोपाल गैस हादसा: कैंसर, गुर्दा पीड़ितों के मुआवजे में देरी की आशंका

भोपाल गैस हादसा: कैंसर, गुर्दा पीड़ितों के मुआवजे में देरी की आशंकाभोपाल, 17 दिसम्बर 2010 । भोपाल गैस हादसे के चलते कैंसर व गुर्दे का मरीज बने पीड़ितों को मध्य प्रदेश सरकार की मांग पर मुआवजा मिलना है, मगर इन पीड़ितों की सूची अब तक भोपाल गैस पीड़ित कल्याण आयुक्त के कार्यालय नहीं पहुंची है। इसी के चलते इन दोनों रोगों से ग्रस्त मरीजों को मुआवजा मिलने में देरी हो सकती है।
गैस पीड़ितों की समस्याओं के निदान के लिए बने मंत्री समूह की जून 2010 में हुई बैठक में लगभग 45 हजार प्रभावितों को मुआवजा देने का निर्णय लेते हुए 740 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई थी।
प्रदेश सरकार के अनुरोध पर मंत्री समूह ने लगभग 2000 कैंसर पीड़ितों और 1000 गुर्दा पीड़ितों को भी मुआवजा देने पर सहमति जताई थी। इसके लिए पीड़ितों को 15 दिसम्बर से नोटिस भेजने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और 19 दिसम्बर से मुआवजा दिया जाना है।
भोपाल गैस पीड़ित कल्याण आयुक्त कार्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार भारत भूषण श्रीवास्तव ने एक सवाल के जवाब में बताया कि कैंसर और गुर्दा पीड़ितों को दो-दो लाख रुपये दिए जाने हैं लेकिन इससे पहले यह सूची प्रदेश सरकार को देनी है।
अभी तक उनके पास 419 गुर्दा पीड़ितों के आवेदन आए हैं, वहीं कैंसर पीड़ितों के आवेदनों में कुछ खामियां पाए जाने पर उन्हें वापस भेज दिया गया है। आवेदनों में से कुछ में तो आठ साल के बच्चे को भी कैंसर पीड़ित दर्शाया गया था जो कि बहुत बड़ी खामी थी।
उन्होंने आगे बताया है कि दोनों बीमारियों से पीड़ित लोगों के आवेदन तय संख्या तक जमा होने पर मुआवजा वितरित किया जाएगा। सूची में तय संख्या से ज्यादा नाम होने पर राज्य सरकार को केंद्र सरकार से मार्गदर्शन लेना हेगा। वहीं मुआवजा देने से पहले मरीज के चिकित्सकीय दस्तावेजों का परीक्षण किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि फिलहाल उनके पास इन दो बीमारियों के मरीजों की अंतिम सूची नहीं आई है, लिहाजा इन्हें मुआवजा मिलने में विलम्ब हो सकता है।
दूसरी ओर प्रदेश के गैस राहत विभाग के उप सचिव के. के. दुबे देरी की इस वजह को मानने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि लगभग 2100 कैंसर पीड़ितों की सूची तैयार हो चुकी है और कल्याण आयुक्त को भेज दी गई है। इसी तरह गुर्दा पीड़ितों की सूची भी भेजी जा रही है।

दिग्विजय सिंह की सीख पर न जाए राहुल: उमा भारती

दिग्विजय सिंह की सीख पर न जाए राहुल: उमा भारतीलखनऊ, 18 दिसंबर। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व नेता एवं मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने शनिवार को कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पर हमला बोलते हुए कहा कि वह कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से देश को बांटने वाली राजनीति का पाठ सीख रहे हैं।
उमा ने लखनऊ में संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि राहुल, दिग्विजय सिंह को अपना गुरु मानते हैं और उनके लिखे नोट्स पढ़ते हैं। मुसलमानों का वोट हासिल करने के लिए राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) पर हमले करने का पाठ राहुल को दिग्विजय सिंह ने ही सिखाया है।
उमा ने कहा कि दिग्विजय सिंह की सीख पर न जाए राहुल..वह गुरु बनने लायक नहीं हैं।
हिंदू संगठनों के अभ्युदय को ज्यादा खतरनाक बताने सम्बंधी बयान पर उमा ने कहा कि राहुल को अपने बयानों में थोड़ी परिपक्वता लानी चाहिए।
विकिलीक्स द्वारा लीक किए गए एक संदेश के अनुसार राहुल ने कथित रूप से अमेरिकी राजदूत टिमोथी जे. रोमर से कहा था कि यद्यपि आतंकी संगठन, लश्कर-ए-तैयबा को भारतीय मुस्लिम समुदाय के कुछ खास तत्वों का समर्थन होने के प्रमाण हैं, लेकिन चरमपंथी हिंदू संगठनों का अभ्युदय ज्यादा खतरनाक हो सकता है। ये हिंदू संगठन धार्मिक तनाव और मुस्लिम समुदाय के साथ राजनीतिक टकराव की स्थिति पैदा करते हैं।
उमा, रामलला (अयोध्या) का दर्शन करने के सिलसिले में लखनऊ पहुंची हैं। हालांकि उनके एक करीबी ने कहा कि वह अयोध्या जाने का कार्यक्रम स्थगित कर सकती हैं।