Tuesday, December 28, 2010

मीडिया के नाम पर उगाही करने वाले एक गिरोह का पुलिस ने भंडाफोड़ किया है.

नई दिल्‍ली : मीडिया के नाम पर उगाही करने वाले एक गिरोह का पुलिस ने भंडाफोड़ किया है. उत्‍तर-पूर्वी जिला पुलिस ने गिरोह के एक युवती सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर उनके पास से इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में प्रयोग होने वाले कैमरे, माईक, पहचान पत्र, वायरलेस सेट, मोबाइल सेट आदि कई सामान बारामद किए हैं. सीमापुरी थाने में इस बाबत मामला दर्ज किया गया है.
जिले के पुलिस उपायुक्‍त के मुताबिक इसी सप्‍ताह इलाके के एक व्‍यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि कुछ लोग मीडिया में खबर प्रकाशित कराने के नाम पर उनसे उगाही करने आते हैं. उगाही घर बनाने को लेकर था. आरोपी युवकों का कहना था कि जो घर पीडि़त ने बनाया है वह अवैध और और इसे मीडिया में दिखाने के बाद इसे सरकार के हाथों तोड़ना निश्चित है. युवकों ने उस मकान के फोटो भी खींच लिए थे और फिर उनसे 25 हजार रुपये की मांग कर दी. धमकी यह भी दी गई कि पैसे नहीं देने पर पुलिस और संबंधित एजेंसियों के पास इसकी शिकायत की जाएगी. पीडि़त ने बिना देर किए पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी थी. शिकायत के बाद पुलिस ने पहले तीन और फिर एक युवक को गिरफ्तार कर इस गिरोह का भंडाफोड़ कर दिया. गिरोह में एक महिला भी थी. उसका नाम ममता है. गिरोह का सरगना सिमरन गुप्‍ता को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.
पूछताछ में पता चला है कि ये लोग एक गिरोह की शक्‍ल देकर उगाही का धंधा कर रहे थे. सिमरन रोहिणी का है. जा‍मिया में पढ़ाई करने वाले सिमरन ने बताया है कि वह कुछ छोटे अखबारों में भी काम किया है. पर ज्‍यादा कमाई के लालच में उसने मीडिया के नाम पर उगाही का धंधा शुरू कर दिया. दो साल पहले जहांगीरपुरी में एक दफ्तर खोलकर कुछ अन्‍य साथियों के साथ मिलकर इस प्रकार की उगाही शुरू हुई. पुलिस ने इनके दफ्तर से कम्‍प्‍यूटर, पांच वायरलेस, दस मोबाइल फोन व कुछ मीडिया संगठनों के कार्ड बरामद किए हैं. गिरोह के अन्‍य सदस्‍यों की तलाश की जा रही है. साभार : जनसत्‍ता

दुनिया भर के 54 देशों में एक साथ प्रसारित होने वाला पहला उर्दू न्‍यूज चैनल 24 घंटे रहें ताजा खबरों के साथ आज शाम 7 बजे. जिसमें बताया गया है

: आज होगी चैनल की लांचिंग : राष्‍ट्रीय सहारा ने अपने पहले पन्‍ने पर विज्ञापन प्रकाशित किया है. जिसमें लिखा है - दुनिया भर के 54 देशों में एक साथ प्रसारित होने वाला पहला उर्दू न्‍यूज चैनल 24 घंटे रहें ताजा खबरों के साथ आज शाम 7 बजे. जिसमें बताया गया है कि अब सहारा ग्रुप का उर्दू चैनल आलमी सहारा भारत और उसके पड़ोसी देशों के अलावा एशिया महाद्वीप के बाहर के कई देशों में भी एक साथ प्रसारित किया जाएगा.
उल्‍लेखनीय है कि सहारा ने इसके लिए काफी पहले से अपनी तैयारी शुरू कर दी थी. अजीज बर्नी के संपादक रहने के समय से ही इस चैनल को लांच करने तथा अंतरराष्‍ट्रीय बनाने की कवायद शुरू कर दी गई थी. लेकिन कई बार यह प्रोजेक्‍ट विभिन्‍न कारणों से मूर्त रूप नहीं ले सका था. उपेंद्र राय ने अजीज बर्नी को इस चैनल से निपटाने के बाद इसके लांचिंग की जिम्‍मेदारी खुद देख रहे थे. चैनल की कमान उन्‍होंने वरिष्‍ठ पत्रकार एजाजू रहमान को दी थी. अजीज बर्नी के भर्ती किए हुए टीवी कर्मियों को अलग कर उन्‍होंने इसके लिए कई नई भर्तियां कीं.
उपेंद्र राय के नेतृत्‍व में ही आलमी सहारा को अंतरराष्‍ट्रीय बनाने की पूरी रणनीति तय की गई है. आज सायं 7 बजे से यह चैनल भारत, पाकिस्‍तान, नेपाल और बंग्‍लादेश के अलावा अफगानिस्‍तान, अर्मेनिया, ऑस्‍ट्रेलिया, अजरबेजान, बहरीन, भूटान, ब्रुनेई, कम्‍बोडिया, उत्‍तर कोरिया, ओमान, पापुआ न्‍यू गुनिया, फिलिपींस, कतर, रूस, सउदी अरब, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम, तजाकिस्‍तान, जार्जिया, हांगकांग, इंडोनेशिया, ईरान, इस्रायल, जापान, जार्डन, कजाकिस्‍तान, कुवैत, लाओस, मलेशिया, मालदीव, मंगोलिया, म्‍यांमार, नेपाल, किर्गिस्‍तान, उज्‍बेकिस्‍तान, तुर्कमेनिस्‍तान, इराक, संयुक्‍त अरब अमीरात, यमन, सीरिया, लेबनॉन, साइप्रस, तुर्की सहित कुल 54 देशों में एक साथ प्रसारित होगा. सूत्रों का कहना है कि आलमी सहारा में अंतरराष्‍ट्रीय खबरों को प्रमुखता दी जाएगी

टीएन नैनन को सर्वसम्मति से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड के टीएन नैनन को सर्वसम्मति से एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। एडिटर्स गिल्ड की सालाना आम सभा में इंडियन एक्सप्रेस के कोमी कपूर को महासचिव चुना गया, जबकि नई दुनिया के सुरेश बाफना कोषाध्यक्ष चुने गए। सभा में मौजूद सदस्यों की ओर से बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने गिल्ड की पिछली टीम राजदीप सरदेसाई, कोमी कपूर व रोहित बंसल का शुक्रिया अदा किया।
आमसभा में इस बात पर सहमति बनी कि पेड न्यूज के खिलाफ गिल्ड के सतत अभियान के हिस्से के तौर पर उन सभी गिल्ड सदस्यों के नाम गिल्ड की वेबसाइट पर 1 फरवरी, 2011 तक डाल दिए जाएंगे, जो इस खतरनाक प्रवृत्ति में शामिल न होने का हस्ताक्षरित हलफनामा देकर यह प्रतिज्ञा करेंगे।
सदस्यों का मानना था कि वेबसाइट पर नाम डालने से पहले सदस्यों को एक माह का वक्त देकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि सभी को हलफनामा पर हस्ताक्षर के लिए गिल्ड का सकरुलर मिल गया है। गिल्ड की आमसभा में इस बात पर खास चिंता जाहिर की गई कि राडिया टेप में जिस तरह के खुलासे हुए हैं, उनमें कुछ प्रतिष्ठित संपादकों ने पत्रकारिता की श्रेष्ठ परंपराओं का ख्याल नहीं रखा। इस घटना से जन-सामान्य के बीच मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। सभी संपादकों से अपील की गई है कि वे मीडिया की गरिमा और सत्यनिष्ठा का हमेशा ख्याल रखें। साभार : भास्‍कर
 

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा

न्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा : पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैर-लोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी मानती है कि बिनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।
जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकीलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्‍ट्रम जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे, जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।
बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य, जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून, जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया, वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे, बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा. सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।
हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात, कि वह बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं, के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।
ऐसे में हम इस बात कोन्यायपालिका ध्वस्त कर रही है लोकतांत्रिक ढांचा : पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) के राष्‍ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने अपने गैर-लोकतांत्रिक और फासीवादी चेहरे को एक बार फिर उजागर किया है। जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी मानती है कि बिनायक सेन प्रकरण के इस फैसले ने अन्ततः लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने का काम किया है। यह न्यायपालिक की सांस्थानिक जनविरोधी तानशाही है, जिसका हम विरोध करते हैं।
जो काम सत्ता के सहारे पूंजीवादी ताकतें कार्यपालिका और व्यवस्थापिका से कराती थीं उसे अब न्यायपालिका कर रही है। पिछले दिनों विकीलिक्स ने हमारी पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी की वह किस तरह देश की महत्वपूर्ण जानकारियों को अमेरिका जैसे देशों से चोरी-छिपे बताती है, और उसके दबाव में जनविरोधी नीतियों को लागू करती है। पिछले साल नक्सलवाद उन्मूलन के नाम पर चलाया गया आपरेशन ग्रीन हंट भी इसी का हिस्सा था। पिछले दिनों राष्ट्रमंडल खेलों से लेकर 2जी स्पेक्‍ट्रम जैसे बड़े घोटाले क्या देशद्रोह नहीं थे, जो उनसे जुड़े सफेदपोशों को बचाने की हर संभव मदद सरकार कर रही है।
बिनायक सेन को आजीवन कारावास देकर न्यायालय ने वंचित तबके के प्रतिरोध को खामोश रहने की चेतावनी दी है, जो अब तक न्याय के अंतिम विकल्प के रुप में न्यायपालिका में उम्मीद लगाया था। हिंदुस्तान में न्यायालयों द्वारा पिछले दिनों जिस तरह से संविधान प्रदत्त धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्य, जिनके तहत आदमी और आदमी के बीच धर्म, जाति और लिंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न करने का आश्वासन दिया गया था, को खंडित किया जा रहा है, यह पूरे लोकतांत्रिक व्यवस्था को फासीवादी व्यवस्था में तब्दील करने की साजिश है।
छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून, जिसके तहत बिनायक सेन को देशद्रोही कहा गया, वह खुद ही एक जनविरोधी कानून है। जो सिर्फ और सिर्फ प्रतिरोध की आवाजों को खामोश करने वाला कानून है। बिनायक सेन लगातार सलवा जुडुम से लेकर तमाम जनविरोधी प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ आवाज ही नहीं उठाते थे, बल्कि वहां की आम जनता के स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े सवालों पर भी लड़ते थे। हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि जिस तरह न्यायालय ने डा. सेन को आजीवन करावास दिया, ठीक इसी तरह भारतीय न्यायालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनउ बेंच ने तीस सितंबर 2010 को कानून और संविधान को ताक पर रखकर आस्था और मिथकों के आधार पर अयोध्या फैसला दिया। न्यायपालिका के चरित्र को इस बात से भी समझना चाहिए कि देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ कांड’ पर न्यायालय ने पुलिस का मनोबल गिरने की दुहाई देते हुए इस फर्जी मुठभेड़ कांड की जांच की मांग को खारिज कर दिया था। भंवरी देवी से लेकर ऐसे तमाम फैसले बताते हैं कि हमारी न्यायपालिका का रुख दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी रहा है।
हम यहां इस बात को भी कहना चाहेंगे कि देश में हो रही आतंकी घटनाओं के लिए न्यायालय भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं, जिनसे न्याय न मिलने की हताशा से कुछ लोग आतंकवाद के प्रति अग्रसर हो रहे हैं। क्या न्यायपालिका बार-बार आंतकी संगठनों की इस बात, कि वह बाबरी विध्वंस, 2002 गुजरात दंगा या फिर अयोध्या फैसले से आहत होकर ऐसा कर रहे हैं, के सवाल को हल करने की कोशिश की। क्योंकि यह सवाल उसके न्याय के समीकरण से जुड़ा है, जो फासीवादी ताकतों को मजबूत कर रहा है। तो वहीं नक्सलवाद जो खुद को एक व्यवस्था परिवर्तन का आंदोलन कहता है, को जनता लोकतंत्र में न्याय न मिलने की वजह से एक नई व्यवस्था के रुप में अपना रही है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था में सबसे ज्यादा जिम्मेदार न्यायपालिका ही है। जो अपने नागरिकों को उनके जीवन से जुडे़ मौलिक अधिकारों को भी नहीं दिलवा पा रही है।
ऐसे में हम इस बात को कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी की तरफ से राजीव यादव द्वारा जारी कहना चाहेंगे कि जो न्यायालय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की अवमानना कर रहे हैं, उनकी अवमानना करने का पूरा अधिकार लोकतांत्रिक जनता को है। क्योंकि विनायक सेन जनता के लिए, जनता द्वारा स्थापित लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं। हम मांग करते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार विनायक सेन के खिलाफ लगाए गए जनविरोधी राजनीति से प्रेरित आरोपों व जनविरोधी छत्तीसगढ़ लोक सुरक्षा कानून को तत्काल रद्द करे और विनायक सेन को रिहा करे।
जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी की तरफ से राजीव यादव द्वारा जारी