Friday, January 28, 2011

झारखंड में युवाओं को रोजगार देने के नाम पर ठगी का कारोबार चलाया जा रहा है.

झारखंड में युवाओं को रोजगार देने के नाम पर ठगी का कारोबार चलाया जा रहा है. और यह कारनामा किया जा रहा है दुनिया की सबसे बड़ी साफ्टवेयर निर्माता कंपनी माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी दिलाने के नाम पर. और इस विज्ञापन को प्रकाशित किया है खुद को दुनिया का सबसे बड़ा अखबार कहने वाले दैनिक जागरण ने. कंपनी के नाम पर कई पदों पर वैकेंसी के लिए विज्ञापन जारी किया गया है.
विज्ञापन में 18 से 30 साल के युवाओं से माइक्रोसॉफ्ट प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से आवेदन मांगे गए हैं. यह विज्ञापन झारंखड में दैनिक जागरण के कई एडिशनों में छपा है. माइक्रोसॉफ्ट के नाम पर जारी विज्ञापन में कुल 2600 पदों के लिए आवेदन मांगे गए हैं. जिसमें जूनियर ऑफिसियल के 1250 पद और जूनियर टेक्निकल के 1350 पदों पर नियुक्ति करने की बात कही गई है. विज्ञापन में बताया गया है कि नियुक्ति इंटरव्यू के माध्‍यम से होगी. इसके लिए आवेदक की न्‍यूनतम शैक्षणिक योग्‍यता 40 प्रतिशत अंकों के साथ किसी भी विषय से इंटमीडिएट होना विज्ञापनआवश्‍यक है. दिलचस्‍प तथ्‍य यह है कि इस विज्ञापन में ये भी कहा गया है नियुक्ति प्रक्रिया से पूर्व कंपनी आवेदक को तीन से छह माह की ट्रेनिंग अपने खर्च पर देगी. चयनित युवाओं को कंपनी 35000 से 65000 रूपये के बीच वेतन देगी. इसके अतिरिक्‍त आवास एवं भोजन सुविधा मुफ्त में मिलेगी सो अलग.
अब आते हैं इस विज्ञापन की कहानी पर. माइक्रोसॉफ्ट के नाम से प्रकाशित इस विज्ञापन में न तो कंपनी का लोगों लगा है और ना ही उसके मुख्‍यालय या स्‍थानीय कार्यालय का पता दर्ज है. विज्ञापन में आवेदकों से आवेदन शुल्‍क के नाम पर 550 रूपये बैंक ऑफ इंडिया के एकाउंट में जमा कराने का भी दिशानिर्देश दिया गया है. चौंकाने वाली बात यह है कि यह एकाउंट कंपनी के नाम से नहीं बल्कि किसी विशाल कुमार नामक सज्‍जन के नाम से है. प्रश्‍न यह है कि क्‍या इतनी बड़ी कंपनी अपने आधिकारिक एकाउंट के बदले किसी निजी एकाउंट से आवेदन शुल्‍क मांगेगी! विज्ञापन में आवेदन शुल्‍क जमा कराने के बाद रसीद और अन्‍य कागजात दिल्‍ली के कालका जी में पोस्‍ट बाक्‍स नम्‍बर 31 या फिर mlpscompany@gmail.com This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेजने के निर्देश दिए गए हैं. जबकि माइक्रोसॉफ्ट का भारत में मुख्‍यालय बंगलुरु में है. विज्ञापन में दिया गया मेल भी आधिकारिक नहीं है. जबकि अधिकांश बड़ी कं‍पनियां अपना आधिकारिक ई-मेल आईडी देती हैं. इन सभी तथ्‍यों से स्‍पष्‍ट है कि माइक्रोसॉफ्ट के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाकर ठगने का प्रयास किया जा रहा है. जिसमें चंद रूपये के बदले विश्‍व का सबसे बड़ा अखबार भी भागीदार बन गया है.
सबसे प्रमुख बात यह है कि यह मीडिया समूह या इसके कर्ताधर्ता इस विज्ञापन को जारी करने से पहले किसी तथ्‍य पर ध्‍यान नहीं दिया. या इन लोगों को इस विज्ञापन में कोई कमी नजर नहीं आई अथवा धन के नाम पर इसकी अनदेखी कर दी गई. पूरा मामला सामाजिक दायित्‍व और विश्‍वसनीयता का है. क्‍या कुछ रूपये के बदले किसी भी बड़े अखबार में ठगी के धंधे का विज्ञापन छपवाया जा सकता है? क्‍या पैसे के लिए अखबार सारे मूल्‍यों की तिलांजलि दे सकते हैं? अगर युवा इस विज्ञापन पर भरोसा करके आवेदन राशि जमा करा दी और लूट लिए गए तो इसके लिए कौन जिम्‍मेदार होगा? क्‍या अखबार के किसी कोने में 'अपने स्‍तर से जांच-परख कर विज्ञापनों पर भरोसा करें' जैसे वाक्‍य लिख दिए जाने से ये अबखार अपने नैतिक एवं सा‍माजिक मूल्‍यों से बरी हो जायेंगे! इस विज्ञापन पर माइक्रोसॉफ्ट इंडिया के लीगल सेल ने आश्‍चर्य जताया है. कंपनी ने इस मामले पर कानूनी कार्रवाई भी करने की बात कही है.

कैट-सल्लू के साथ सेक्स करने की क्यों है

कंडोम कंपनी के सेक्स सर्वे के निहितार्थ : कैट-सल्लू के साथ सेक्स करने की क्यों है ख्वाहिश : गज़ब अंतरविरोधों भरी दुनिया है. जनता के लिए नियम कानून अलग और धनपशुओं के लिए अलग. इसीलिए तो एक धनपशु सैकड़ों लड़कियों के साथ सेक्स करने के बाद भी पब्लिक फीगर बना रहता है और एक बेचारा गांव से आया कोई नौजवान या कोई शहरी माडर्न मिडिल क्लास टीनएज किसी एक छोकरी पर मर मिटने के जुर्म में जेल की हवा खाने लगता है.
क्योंकि वो छोकरी को पैसे से नहीं, दिल से चाहता था और छोकरी को दिल नहीं, पैसा चाहिए था, सो उसकी चाहत को अपराध घोषित कर दिया. यहां हम साफ कर दें कि छोकरी का मतलब सिर्फ उन लड़कियों से है जो अपना देह बेचती हैं, पैसे वालों को, पैसे के लिए, और किसी गरीब को प्यार के इजहार के बदले थप्पड़ लगा देती हैं क्योंकि वे माडर्न कालगर्ल होती हैं जिन्हें ऐशो-आराम भरी जिंदगी चाहिए, तुरंत, किसी भी कीमत पर. आए दिन ऐसी घटनाएं, खबरें पढ़ने सुनने को मिलती रहती हैं. पर धनपशु के लिए खूबसूरत बालाएं पैसे के दम पर उपलब्ध हैं. कई अभिनेत्रियां लाखों लेकर सेक्स को तैयार रहती हैं, इससे संबंधित स्टिंग भी टीवी चैनलों पर आ चुके हैं.
ये बाजार है और इसका दर्शन भी भरपूर बाजारू है. कंडोम बेचने वाली कंपनियों को शरीफ सेक्स में भरोसा नहीं है. वे यौन उत्तेजना को भड़काने में लगी रहती हैं, वे फटाफट सेक्स, जहां चाहे वहां सेक्स को प्रमोट करती रहती हैं पर उनका एक ही कहना होता है कि कंडोम का इस्तेमाल जरूर करें वरना गड़बड़ हो जाएगा, एड्स हो जाएगा और घुट घुट कर भयानक तरीके से मरेंगे. ध्यान दें, पहले उकसाना, फिर डराना, फिर माल बेचना. कंडोम कंपनियों में बड़ी बेचैनी है. भारत की शराफत उन्हें रास नहीं आ रही क्योंकि लोग धड़ाधड़ कंडोम नहीं खरीदते. पर अब जमाना बदल रहा है.
नई पीढ़ी पूरी बाजारू ट्रेनिंग लेकर मैदान में आ चुकी है. शराफत को वो समाजवादी दौर, नैतिकता का वो गांधीवादी दौर जाने कबका खत्म हो गया. जिनमें कुछ बचा है तो वो जीवन के उत्तरार्ध में पहुंचे हुए हैं, उनके लिए यौनेच्छा शांत करने से ज्यादा जरूरी गृहस्थी को बचाना, बनाना व बढ़ाना है. सो, कंडोम कंपनियों की युवाओं के बीच चांदी हो रही है. वे अपने सर्वे से नौजवानों के दिमाग में यह बिठाने में सफल हो चुकी हैं कि चाहे जिसके साथ सेक्स करो, कोई गलत नहीं है, बस कंडोम साथ रखो. नौजवान मन ही मन कैटरीना कैफ से सेक्स करने लगते हैं. युवतियां आंख बंद कर सलमान खान को बाहों में जकड़ रही होती हैं. अभी के पहले ऐसे खयाल दिमाग में आने पर युवक-युवती व इनके मां-पिता इसे भटकाव मानते थे, और मन को बुरी चीजों से हटाकर अच्छे कामों में लगाने के बारे में सोचते थे, वह एक एक्स्ट्रीम था जहां सेक्स पर सोचना गुनाह था, जहां सेक्स को जीवन का हिस्सा मानना गुनाह था, तभी तो देहातों में कई ऐसे किस्से होते हैं कि रात सबके सोने के बाद पुरुष घरवाली के घर में घुसता था और सबके जगने के पहले निकल भागता था, जैसे कुछ हुआ ही न हो और घर वाले भी सब जान के इस दर्दनाक दर्शन से अनजान बने रहते थे.
कम से कम अब मां-पिता यह कबूल तो करने लगे हैं कि बेटा का शादी हुआ है तो वह रात में अपनी पत्नी के साथ ही सोएगा. पर अब जो नई एक्स्ट्रीम डेवलप हो रही है, जो यूरोप में लोप की तरफ है, क्योंकि वहां देह में अब किसी का दिल नहीं लगता, स्त्री देह और पुरुष देह, दोनों ने एक दूसरे की हदें जान ली हैं या बचपन से जान लेते हैं, सो, कोई रस, कोई इच्छा, कोई लालसा देह को लेकर नहीं बची होती है पर यहां तो देह के लिए बचवा से लेकर बुढवा तक पगलाए रहते हैं क्योंकि देह का दर्शन बाजार तेजी से फैला रहा है ताकि उसके देह से संबंधित सारे माल बिकें, सेक्सी मोबाइल से लेकर सेक्सी परफ्यूम तक, कंडोम से लेकर वियाग्रा तक.
इस नए माहौल में, जहां कंडोम कंपनियां सेक्स सर्वे कराकर बताती हैं कि महिलाएं अधेड़ माल्या से लेकर सलमान व धोनी तक से सेक्स कराने को आतुर हैं और पुरुष कैटरीना से लेकर बिपाशा तक से संबंध बनाने को इच्छुक हैं, वहां अब पिता के साथ बेटा भी आंखें बंद कर कैटरीना के बारे में सोच रहा होता है और मां के साथ बेटी भी सल्लू के मसल्स के जरिए उसके शरीर के हर हिस्से का नाप-तौल कर रही होती हैं. तो अब वह दीवार टूट चुकी है जिसे हम श्रेष्ठ भारतीय सभ्यता और संस्कृति कहकर गर्वान्वित हुआ करते थे.
कम से कम शहरों में तो टूट ही गई है और देहातों में भी वर्जनाओं के सामूहिक विसर्जन का उत्सव जोरों पर चल रहा है. कंडोम कंपनी के सर्वे को पढ़िए, संभव है पहले ही पढ़ चुके होंगे, क्योंकि इसे ज्यादातर अखबारों, पत्रिकाओं और पोर्टलों ने प्रकाशित किया है, क्योंकि कंडोम का विज्ञापन बहुत रेवेन्यू देता है सभी को. इस खबर को पढ़ने के बाद ये जरूर सोचें कि इस खबर को कितने शातिर तरीके से प्लांट कराया गया है क्योंकि इस प्रायोजित खबर से कंडोम के बाजार में भरपूर उछाल आएगा और आपकी सुसुप्त इच्छाओं में हवाई जहाज वाले सेक्सी पंख लग जाएंगे.
खबर इस प्रकार है...
''मुंबई। कैटरीना कैफ का हॉट और सेक्सी अंदाज यदि बॉलीवुड में अपने जलवे बिखेर रहा है तो उनके एक्स ब्वॉयफ्रैंड सलमान खान के "किलर लुक" का भी क्रेज कम नहीं हुआ है। शायद यही कारण है कि देश के अधिकतर मर्द और औरतें इन दोनों स्टार्स के साथ सेक्स करने की ख्वाहिश रखते हैं। हाल ही में एक मशहूर कंडोम कंपनी ने एक सर्वे कराया जिसमें लोगों से पूछा गया था कि कि वह किस प्रसिद्ध हस्ती के साथ सेक्स करने की इच्छा रखते हैं तो अधिकतर मर्दो ने कैटरीना कैफ का नाम लिया जबकि महिलाओं की जुबां पर सलमान खान का नाम था। कंपनी ने भारत के सात शहरों में 18-45 आयु वर्ग के लोगों के बीच यह सर्वे किया। इनसे पूछा गया था कि खेल, राजनीति, ग्लैमर, बिजनेस से जुड़ी मशहूर हस्तियों में किसे अपना सेक्स पार्टनर बनाना चाहेंगे। ज्यादातर पुरूषों ने कैट को वोट दिया जबकि महिलाओं ने सलमान के साथ हमबिस्तर होने की इच्छा जताई। शादीशुदा होने के बावजूद भी ऎश्वर्या राय दूसरे पायदान पर हैं। बंगाला बाला बिपाशा बासु भी दूसरे नंबर पर रहीं। टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा, दीपिका पादुकोण, सोनम कपूर, आईटम गर्ल राखी सावंत और बैडमिन्टन चैम्पियन सायना नेहवाल को भी वोट दिए गए हैं। सलमान पर मर मिटने वाली लड़कियों ने रणबीर कपूर को दूसरे नंबर पर रखा। किंग खान शाहरूख खान तीसरे और क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी चौथे नंबर पर रहे। इन अभिनेताओं के अलावा महिलाओं की रितिक रौशन, राहुल गांधी, इमरान हाशमी, सैफ अली खान और इमरान खान व युवराज सिंह को भी सेक्स पार्टनर बनाने की ख्वाहिश है। बॉक्सर विजेन्दर सिंह, शूटर अभिनव बिन्द्रा, क्रिकेटर विराट कोहली और जूनियर सिद्धार्थ माल्या भी इस सूची में है।''
पढ़ लिया आपने. कापी एडिटर ने अपने शब्दों व कापी के ज्ञान को उड़ेल कर रख दिया है इस खबर को लिखने में. चलिए, इस कापी के दूसरे पक्ष के बारे में कुछ और बात कर लेते हैं. बाजार गड़बड़ियां फैला रहा है मुनाफा कमाने के लिए, माल बेचने के लिए पर कुछ अच्छे काम भी अनजाने में कर दे रहा है. जैसे सेक्स को सर्वाधिक गोपनीय विषय से आम बातचीत का विषय बना रहा है. लेकिन बस इसकी दशा दिशा गड़बड़ है. सेक्स को सनसनी की तरह परोसना खराब है. जानवर और मनुष्य की जो बेसिक इंस्टिक्ट है, उसमें खाना-पीना व सेक्स भी शामिल है. जानवर सेक्स को लेकर संवेदनशील नहीं रहता, समय पर ही वे सेक्सातुर होते हैं. पर मनुष्य ने जो माहौल सृजित किया है उसमें अपने अतिरिक्त दिमागी बोध (एएमसी भी कह सकते हैं यानि एडिशनल माइंड कानशसनेस) के कारण हर पल सेक्सातुर रहता है, जहां अकेला हुआ कि सेक्सातुर हुआ. ये जो मनुष्य के पास एएमसी है, इसका इस्तेमाल सिर्फ सेक्स जगाने में होता रहता है, सेक्स से मुक्त होने में नहीं, यही कारण है कि कोई साधु बाबा अपने लिंग से कहीं पत्थर को तोड़कर काम से मुक्ति पाने का रास्ता तलाश रहे होते हैं तो कोई चोरी-छिपे अपनी शिष्याओं को कुंठित वासना का शिकार बना रहा होता है.
बाजार ने सेक्स को अल्टीमेट और चरम चीज बना दिया है, कुछ ऐसे जैसे इसी को खाओ, पिओ, पहनो, ओढ़ो और बिछाओ. वरना पिछड़े माने जाओगे. बेचारे युगल, आखिर दिन-रात, दिन-रात में कोई कितनी बार सेक्स कर सकता है. जिंदगी में और भी ग़म है सेक्स के सिवा. या सेक्स के अलावा बहुत सारे काम है दुनिया में. लेकिन बाजार राजी नहीं है. वह कह रहा है कि सेक्स से फुर्सत पाओ तो सेक्सी खाना खाओ, सेक्सी कपड़े पहने, सेक्सी नृत्य करो, सेक्सी पार्टीज में इंज्वाय करो, सेक्सी परफ्यूम लगाओ, सेक्सी बातें करो, सेक्सी मोबाइल खरीदो, सेक्सी चैट करो, सेक्सी सैर करो... मतलब सेक्स न हुआ आलू हुआ जिसे हर सब्जी, हर पकवान में शामिल कर लिया. अब जब सब कुछ सेक्सी हो रहा हो तो सेक्स पर बतियाने से शरम कैसा. सेक्स के आदि अंत की कथा का वर्णन अभिभावकों को अपने किशोर बेटों से कर देना चाहिए ताकि बेटा इस रहस्यमयी सेक्सी संसार के तिलिस्म में न बिला जाए. अगर ऐसा न करेंगे तो संभव है कि आप अकेले में कैटरीन के साथ सोए हों और उधर बेटा भी कैटरीना के कपड़े उतार रहा हो, और दोनों ही इस प्रक्रिया में कंडोम की दुकान पर पहुंच डिब्बी पाकेट में डाल अपनी-अपनी लोकल कैटरीनाओं की तलाश में लग जाएं. जय हो.
यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया

Thursday, January 27, 2011

कितना प्रभावी घरेलू हिंसा कानून

पत्नी के साथ मारपीट के आरोपी वरिष्ठ राजनयिक अधिकारी अनिल वर्मा को लंदन से वापस दिल्ली बुलाने का फैसला कर सरकार ने उन्हें फौरी तौर पर राहत तो दे दी है, लेकिन इस मामले ने एक बार फिर घरेलू हिंसा की हकीकत को उजागर किया है। ब्रिटेन ने भारत सरकार पर अनिल वर्मा को दी गई राजनयिक छूट वापस लेने का दबाव बनाया था, ताकि ब्रिटिश कानून के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सके। लंदन का कहना था कि वह ब्रिटेन में पदस्थ राजनयिकों द्वारा कानून का उल्लंघन कतई बर्दाश्त नहीं करेगा।
मगर भारत सरकार ने ब्रिटेन के इस आग्रह को ठुकराकर अनिल वर्मा को दिल्ली बुला लिया। यहां उनके खिलाफ पत्नी के साथ मारपीट के आरोपों की जांच होगी। इस क्रम में उन्हें भी अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा। अगर वह दोषी पाए गए, तो भारतीय नियम-कायदे के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि जांच की प्रक्रिया शुरू होने के बाद कब पूरी होगी। गौरतलब है कि अनिल वर्मा की पत्नी पारोमिता ने एक महीना पहले उन पर गरमागरम बहस के दौरान मारपीट का आरोप लगाया था। कथित तौर पर वह राजनयिक हमेशा कहता था कि कूटनयिक छूट मिलने के कारण कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
इस प्रकरण ने महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा को फिर से बहस के केंद्र में ला दिया है। कुछ साल पहले अपने ही देश में एक अनपढ़ पुरुष ने अपनी पत्नी को महज इसलिए जिंदा जला दिया था, क्योंकि उसने भोजन में नमक कम डाला था। अब एक आईएएस अधिकारी अनिल वर्मा द्वारा रेलवे में अधिकारी के पद पर काम करने वाली पत्नी की कथित तौर पर पिटाई का मामला सामने आया है। दरअसल हमारे देश में घरेलू हिंसा इतनी आम है कि चाहे महिला अनपढ़ हो या पढ़ी-लिखी, चाहे वह घर में रहती हो या बाहर काम करने जाती हो, इसका शिकार होती रहती है।
नारीवादी संगठन और सरकार, दोनों महिला सशक्तीकरण के लिए आर्थिक सशक्तीकरण को अनिवार्य मानते हैं। आज की भारतीय युवतियां महत्वाकांक्षी हैं और नौकरी को प्राथमिकता देने वाला एप्रोच उनमें साफ झलकता है। लेकिन समाज की मानसिकता आज भी दकियानूसी है। एक तरफ जहां युवतियों में पेशेवर जज्बा बढ़ रहा है, वहीं कामकाजी महिलाओं पर घरेलू हिंसा के मामले भी सामने आ रहे हैं। आरटीआई इंटरनेशनल वुमेन ग्लोबल हेल्थ इंपरेटिव और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन वुमेन द्वारा कराए गए शोध के मुताबिक, शादीशुदा कामकाजी महिलाओं को घरेलू हिंसा का ज्यादा खतरा झेलना पड़ता है। यह बात दीगर है कि घरेलू हिंसा का शिकार होने पर अधिकांश महिलाएं अपने आंसू और शरीर पर पड़े निशान छिपा लेती हैं। ये महिलाएं कई तरह की मजबूरियों के चलते पुलिस के पास शिकायत करने भी नहीं जातीं।
सनद रहे कि पिछली सरकार ने घरेलू हिंसा महिला संरक्षण विधेयक का जो मसौदा महिला संगठनों और अन्य संगठनों के पास उनकी राय जानने के लिए भेजा था, उसमें पुरुष द्वारा पत्नी को कभी-कभार एकाध थप्पड़ मारने वाली घटना को घरेलू हिंसा नहीं ठहराया गया था। नारीवादी संगठनों के विरोध दर्ज कराने के बाद इसे मसौदे से हटाया गया। यों तो 2006 में ही महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण प्रदान करने के लिए ?घरेलू हिंसा महिला संरक्षण कानून 2005? लागू कर दिया गया, पर अधिकांश राज्य सरकारें इसके प्रति अब भी गंभीर नजर नहीं आतीं। पुलिस का नजरिया भी इस मुद्दे पर संवेदनशील नहीं रहता, जिससे पीड़िता की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ जाती हैं। जाहिर है कि राज्य का चरित्र ही पुरुष प्रधान है। 26 अक्तूबर, 2006 को जब यह कानून लागू किया गया, तो यूपीए सरकार में तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने अगले दिन टिप्पणी की थी कि उन्हें किसी भी पुरुष ने इस कानून के लागू होने पर बधाई तक नहीं दी है। जाहिर है, उनका संदेश साफ था।
बताते हैं कि लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग को अनिल वर्मा के पत्नी के साथ मारपीट करने के मामले की जानकारी पहले से थी, लेकिन उन्होंने इसे दबाने की कोशिश की थी। ऐसे में यह देखने वाली बात होगी कि इस मामले की जांच कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी होगी।

स्वामी विवेकानंद के विचार उनकी मान्यताओं और जीवन दर्शन का तो स्पष्ट प्रमाण हैं

मार्गदर्शक कर्मयोगी
वेदांत के प्रकांड विद्वान, आडंबरों के प्रबल विरोधी और पाश्चात्य विश्व में हिंदू धर्म की सारगर्भित व्याख्या करने वाले प्रख्यात मनीषी स्वामी विवेकानंद ने स्वयं को न तो कभी तत्व जिज्ञासु की श्रेणी में रखा, न सिद्ध पुरुष माना और न कभी दार्शनिक ही कहा। उन्होंने जीवन में सदैव चरित्र निर्माण को प्रमुखता देने और सत्य बोलने पर बल दिया। उनका मानना था कि परोपकार और प्रेम ही जीवन है, जबकि संकोच व द्वेष मृत्यु।
उन्हें अपने देशवासियों की स्थिति देखकर पीड़ा होती थी। अध्यात्म के पथ पर चलने वाला यह योगी उस मार्ग तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वह इस देश की समग्र उन्नति चाहता था। कहने को वह शक्ति मार्ग के उपासक थे, लेकिन आधुनिक चिंतन उन्हें एक ऐसामनीषी बनाता था, जिसे भारत के सुखद भविष्य के रास्ते का पता था।
वह हमारे पिछड़ेपन का कारण हमारी सोच को मानते थे। उनके मुताबिक, हमने उसी दिन से मरना शुरू कर दिया, जब से हम अन्यान्य जातियों से घृणा करने लगे। यह मृत्यु विस्तार के बिना किसी उपाय से रुक नहीं सकती, जो जीवन का गति नियामक है। दास जाति के दोष, पराधीनता के जन्म, पाश्चात्य विश्व के लोगों की सफलता और किसी राष्ट्र की दुर्बलता के कारणों का समय-समय पर अपने प्रवचनों व भक्तों को लिखे पत्रों में उन्होंने विस्तार से खुलासा किया है। उनका सपना था कि पराधीन भारत के बीस करोड़ लोगों में नवशक्ति का संचार हो, करोड़ों पददलित गरीबी, छल-प्रपंचों, ताकतवरों के अत्याचारों और अशिक्षा के अभिशाप से मुक्त हों तथा उनके जीवन में खुशहाली आए। इसके लिए उन्होंने ईश्वर पर भरोसा रखते हुए नि:स्वार्थ भाव से चारित्रिक दृढ़ता के साथ कर्तव्य पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी।
उनका स्पष्ट मत था कि प्रत्येक दास जाति का मुख्य दोष ईर्ष्या होता है और सद्भाव का अभाव पराधीनता उत्पन्न करता और उसे स्थायी बनाता है। जिनकी सदाचार संबंधी उच्चाभिलाषा मर चुकी है, जो भविष्य की उन्नति के लिए बिलकुल भी चेष्टा नहीं करते और भलाई करने वाले को दबाने के लिए सदा तत्पर रहते हैं, उन मृत जड़ पिंडों के भीतर प्राण संचार कर पाना असंभव है। अमेरिकी और यूरोपीय नागरिक विदेश में भी अपने देशवासियों की सहायता करते हैं, जबकि हिंदू अपने देशवासियों को अपमानित होते देख हर्षित होते हैं।
विवेकानंद भारतीयों की उन्नति की पहली शर्त स्वाधीनता मानते थे। यह स्वाधीनता विचारों की अभिव्यक्ति के साथ खान-पान, पोशाक, पहनावा, विवाह आदि हर बात में मिलनी चाहिए। लेकिन यह स्वाधीनता दूसरों को हानि पहुंचाने वाली नहीं होनी चाहिए। वह कहा करते थे, चट्टान के समान दृढ़ रहो, सत्य की हमेशा जय होती है। देश को नवविद्युत शक्ति की आवश्कता है, जो जातीय धमनी में नवीन बल उत्पन्न कर सके।... नि:स्वार्थ भाव से काम करने में संतुष्ट रहो, अपनी आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध, दृढ़ और निष्कपट रखते हुए किसी को धोखा न दो। क्षुद्र मनुष्यों और मूर्खों की बकवास पर ध्यान न दो, क्योंकि सैकड़ों युगों के उद्यम से चरित्र का गठन होता है और सत्य का एक शब्द भी लोप नहीं हो सकता।
परतंत्र भारत में देशवासियों की गरीबी उन्हें विचलित करती थी। विवेकानंद खुद को न सिर्फ निर्धन मानते थे, बल्कि निर्धनों से प्रेम भी करते थे। वह कहते थे कि देश के जो करोड़ों नर-नारी गरीबी में फंसे हैं, उनके लिए किसका हृदय रोता है? उनके उद्धार का क्या उपाय है? वे अंधकार से प्रकाश में नहीं आ सकते, न उन्हें शिक्षा प्राप्त होती है। उन्हें इस बात की चिंता होती थी कि कौन उन्हें प्रकाश देगा और कौन उन्हें द्वार-द्वार शिक्षा देने के लिए घूमेगा। स्वामी जी महात्मा उन्हें मानते थे, जिसका हृदय गरीबों के लिए सदैव द्रवीभूत होता है, अन्यथा वह दुरात्मा है। उनके मुताबिक, जब तक देश में करोड़ों लोग भूखे और अशिक्षित हैं, तब तक वह हरेक आदमी, जो उनके खर्च पर शिक्षित हुआ है, विश्वासघातक है। गरीबों को कुचलकर धनवान बनकर ठाठ-बाट से चलने वाले लोग यदि करोड़ों देशवासियों के लिए कुछ न करें, तो घृणा के पात्र हैं।
स्वामी विवेकानंद के विचार उनकी मान्यताओं और जीवन दर्शन का तो स्पष्ट प्रमाण हैं ही, यह संदेश भी देते हैं कि उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर ही विश्व का कल्याण संभव है। इसलिए देश की उन्नति के लिए उनके बताए मार्गों पर चलना जरूरी है।

हृदय के पास 40 दिन से फंसा चाकू निकालकर दिया जीवनदान

भोपाल, 27 जनवरी 2011। राजधानी भोपाल के चिकित्सकों ने एक 15 वर्षीय बालक के हृदय के पास 40 दिन से फंसे चाकू को निकालकर उसे नया जीवन देने में सफलता हासिल की है। यह तो जीतेश की खुशनसीबी रही कि चाकू ने उसके दिल को कोई हानि नहीं पहुंचाई।
चिकित्सक डॉ. जे. पी. पालीवाल बताते हैं कि लगभग 40 दिन पहले जीतेश लोधी जब घर पर काम कर रहा था, तभी सामान रखने की कोशिश में एक चाकू उसकी पीठ में घुस गया और उसका मूठ का हिस्सा टूट गया। चाकू का नुकीला हिस्सा शरीर के अंदर रह गया।
जीतेश लोधी के परिजनों का कहना है कि पीठ से खून निकलने पर वे उसे एक चिकित्सक के पास ले गए, तो उन्होंने कुछ टांके लगाकर इलाज कर दिया। इसके बाद भी जीतेश को दर्द होता रहा और तकलीफ भी हुईं। डॉ. पालीवाल बताते हैं कि उन्होंने जब जीतेश का परीक्षण किया तो उन्हें कोई नुकीली वस्तु हृदय के पास नजर आई।
डॉ. पालीवाल कहते हैं कि जीतेश के शरीर से चाकू निकालना एक चुनौती थी। उन्होंने सिअर मशीन की मदद से चाकू किस जगह है उसका ठीक तरह से परीक्षण किया और अपने सहयोगियों की मदद से उसका ऑपरेशन किया। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि चाकू के नुकीले हिस्से से शरीर के किसी नाजुक अंग को क्षति न पहुंचे। जब चाकू उनकी पहुंच में आ गया तो उन्होंन तय किया कि चाकू को भोथरी (गैर नुकीली) तरफ से निकाला जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि नुकीली तरफ से निकालने पर नाजुक अंग को आघात लगने की आशंका थी।
डॉ. पालीवाल ने बताया कि लगभग सवा घंटे तक चले आपरेशन के बाद सफलतापूर्वक लगभग छह इंच लम्बे चाकू को निकाल लिया गया। यह चाकू खून की धमनी से बमुश्किल दो सेंटीमीटर व हृदय से लगभग डेढ़ इच की दूरी पर चाकू था। अब जीतेश स्वस्थ्य है।

मध्य प्रदेश में हल्की बारिश, बढ़ सकती है सर्दी

मध्य प्रदेश में हल्की बारिश, बढ़ सकती है सर्दीभोपाल, 27 जनवरी 2011। मौसम में आ रहे बदलाव के बीच मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश होने के साथ सर्दी बढ़ने का अंदेशा है।
मैसम विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश में दिन में चटख धूप निकलने से न्यूनतम तापमान में उछाल का सिलसिला जारी है। रातों में सर्दी अब भी बरकरार है। यही कारण है कि अधिकांश हिस्सों मे न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस के ऊपर पहुंच गया है। प्रदेश में सबसे सर्द स्थान दतिया रहा जहां न्यूनतम तापमान सात डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
मौसम विभाग का पूर्वानुमान है कि आगामी 24 घंटों में रीवा व शहडोल में बारिश हो सकती है। ऐसा होने से सर्दी की एक बार फिर वापसी हो सकती है।